जबलपुर, 19 जून।
जब जीवन की आपाधापी में मनुष्य स्वयं से दूर होने लगता है, तब गीता उसे पुनः अपने अंतराल से परिचित कराती है। इसी भावभूमि पर विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी शाखा, जबलपुर द्वारा आई.एम.ए. सभागार में आयोजित “व्यवहार में गीता” विषयक विमर्श ने उपस्थित जनसमुदाय को आत्मचिंतन, कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय मूल्यों का संदेश दिया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी के अखिल भारतीय महासचिव भानुदास धाक्रस ने अपने ओजस्वी एवं चिंतनपरक उद्बोधन में कहा कि गीता केवल शास्त्र नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण को आलोकित करने वाला दिव्य पथप्रदर्शक है। यह मनुष्य को परिस्थितियों का दास नहीं, बल्कि उनका साधक बनने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि जैसे पर्वत-शिखर पर पहुँचने के बाद दृष्टि का विस्तार हो जाता है, वैसे ही आत्मिक उन्नयन से व्यक्ति का चिंतन व्यापक और दृष्टिकोण उदात्त हो जाता है। तब वह स्वयं के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के हित को भी समान भाव से देख पाता है।
श्री धाक्रस ने कहा कि अनुकूलताओं में विनम्र बने रहना और प्रतिकूलताओं में संतुलित रहना ही गीता का व्यवहारिक दर्शन है। जीवन की कठिन घड़ियाँ मनुष्य के वास्तविक संस्कारों और व्यक्तित्व की परीक्षा लेती हैं। ऐसे समय में धैर्य, संयम और सद्व्यवहार ही व्यक्ति की सच्ची पहचान बनते हैं।
उन्होंने कृतज्ञता को मानवीय जीवन का अलंकार बताते हुए कहा कि जिन-जिन व्यक्तियों के सहयोग से हमारा जीवन सुगम बनता है, उनके प्रति आभार का भाव ही हमें श्रेष्ठ मनुष्य बनाता है। कृतज्ञता अहंकार को गलाकर संवेदनशीलता और विनम्रता का संचार करती है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में विवेकानन्द केन्द्र जबलपुर विभाग के संचालक वेदप्रकाश शर्मा ने कहा कि राष्ट्रनिर्माण कोई सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि जागृत नागरिकों के सतत पुरुषार्थ का परिणाम है। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करे तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः संभव है।
कार्यक्रम में नगर के प्रबुद्ध नागरिकों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों एवं युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। समापन अवसर पर वातावरण शांति मंत्र के स्वर से गुंजायमान हो उठा, मानो गीता का संदेश प्रत्येक हृदय में नई चेतना का दीप प्रज्वलित कर रहा हो।
वास्तव में, गीता का सार केवल पढ़ने में नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरने में है; क्योंकि जीवन की वास्तविक साधना मनुष्य के आचरण में ही दिखाई देती है।

व्यवहार में गीता : स्वयं को ऊँचा उठाने का मार्ग दिखाती है गीता — भानुदास धाक्रस










