बालिका छात्रावास में आग के 6 दिन बाद पहुंचे DPC दिवाकर तिवारी
सतना।
घटना के दिन मासूमों की सुध क्यों नहीं ली? जले बिस्तर-कपड़ों के बीच छह दिन बाद हुआ निरीक्षण, बच्चियां आज भी एक ही कपड़े में गुजारा करने को मजबूर
चित्रकूट। रजौला बालिका छात्रावास में 4 और 5 अगस्त की दरम्यानी रात लगी भीषण आग ने कई मासूम छात्राओं का बिस्तर, कपड़े और जरूरी सामान खाक कर दिया, लेकिन इस गंभीर घटना के बाद जिम्मेदार अधिकारियों की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
आग लगने के छह दिन बाद DPC दिवाकर तिवारी निरीक्षण करने पहुंचे। उनके साथ APC नीलम कुशवाहा और BRCC मझगवां भी मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि आग शॉर्ट सर्किट के कारण लगी थी। देर रात 112 की सूचना पर पहुंची फायर ब्रिगेड ने आग पर काबू पाया था।
लेकिन सवाल यह है कि जब छात्रावास में रहने वाली बच्चियों का बिस्तर और पूरा सामान जल गया था, तब DPC घटना के दिन मौके पर क्यों नहीं पहुंचे? क्या छह दिन तक यह घटना इतनी मामूली थी कि मौके का जायजा लेने की जरूरत महसूस नहीं हुई?
मासूमों के बिस्तर जले, कपड़े जले… अधिकारी छह दिन बाद पहुंचे
आग की चपेट में आने से कई बच्चियों के बिस्तर, कपड़े और निजी सामान पूरी तरह जल गए। हालात ऐसे हैं कि कई छात्राएं अपने पास बचे कपड़ों में ही गुजारा करने को मजबूर हैं। जिन बच्चियों को तत्काल मदद, नए कपड़े और बिस्तर की जरूरत थी, उनके बीच जिम्मेदार अधिकारी छह दिन बाद निरीक्षण करने पहुंचे।
यह घटना सिर्फ आग लगने तक सीमित नहीं है। यह बालिका छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था, सूचना तंत्र और विभागीय संवेदनशीलता—तीनों पर सवाल खड़े करती है।
घटना के दिन निरीक्षण होता तो शायद कई सवाल वहीं उठते
यदि आग लगने के बाद ही DPC और संबंधित अधिकारी मौके पर पहुंचते, तो छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था, विद्युत वायरिंग, अग्निशमन इंतजाम और बच्चियों को हुए नुकसान की वास्तविक स्थिति तत्काल सामने आ सकती थी। लेकिन छह दिन बाद पहुंचे अधिकारियों के निरीक्षण ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या जिम्मेदार अधिकारी घटना के दिन मौके पर जाकर हालात देखने की जहमत नहीं उठा सकते थे?
अब सिर्फ निरीक्षण से काम नहीं चलेगा। यह भी सामने आना चाहिए कि घटना की सूचना अधिकारियों को कब मिली, तत्काल मौके पर कौन पहुंचा, विभागीय अधिकारियों को सूचना क्यों नहीं दी गई और बच्चियों के जले सामान की भरपाई के लिए अब तक क्या किया गया?
मासूमों का बिस्तर जल गया, कपड़े जल गए और सामान राख हो गया—लेकिन जिम्मेदार विभाग की कार्रवाई छह दिन बाद शुरू हुई। अब सवाल निरीक्षण का नहीं, जवाबदेही का है।










