आयुष्मान आरोग्य मंदिर या ‘बीमार व्यवस्था’ का अड्डा

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आयुष्मान आरोग्य मंदिर या ‘बीमार व्यवस्था’ का अड्डा

 

डॉक्टर गायब, मेडिकल ऑफिसर नदारद; नर्स-टेक्नीशियन के भरोसे गरीबों का इलाज — 63 में सिर्फ 53 केंद्र संचालित, 35 को ही पूरा स्टाफ

 

उजला दर्पण | जबलपुर

 

गरीबों को घर के पास बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने के उद्देश्य से खोले गए आयुष्मान आरोग्य मंदिर अब खुद स्वास्थ्य व्यवस्था की बीमारी बनते नजर आ रहे हैं। सरकारी दावों और जमीन पर हकीकत के बीच इतना बड़ा अंतर है कि इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाला गरीब मरीज कई बार व्यवस्था से ही हारकर लौटने को मजबूर है।

 

शहर में 63 आयुष्मान आरोग्य मंदिर खोले जाने थे, लेकिन तीन वर्ष बाद भी 10 केंद्र भवन के अभाव में शुरू नहीं हो सके। वर्तमान में सिर्फ 53 केंद्र संचालित हैं। इनमें भी सभी केंद्रों को पूरा मानव संसाधन उपलब्ध नहीं है।

 

35 केंद्रों को ही मिला पूरा स्टाफ

 

सबसे गंभीर स्थिति स्टाफ की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार तय स्टाफ में से सिर्फ 35 क्लीनिकों को ही पूरा स्टाफ मिल पाया है। शेष 18 केंद्रों में डॉक्टरों की नियुक्ति अब तक नहीं हो सकी है। ऐसे में सवाल सीधा है—बिना डॉक्टर के आयुष्मान आरोग्य मंदिर आखिर किसके लिए और किस भरोसे पर चल रहे हैं?

 

मरीज 30-40, डॉक्टर का इंतजार खत्म नहीं

 

इन केंद्रों पर प्रतिदिन करीब 30 से 40 मरीज पहुंच रहे हैं। छोटी बीमारी के उपचार की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को भी स्टाफ की गैरमौजूदगी या डॉक्टर के अभाव में इंतजार करना पड़ता है। कई मरीज अंततः विक्टोरिया अस्पताल या मेडिकल कॉलेज की ओर जाने को मजबूर हो जाते हैं।

 

यानी जिस व्यवस्था को गरीब के घर के पास इलाज पहुंचाने के लिए बनाया गया था, वही व्यवस्था मरीज को बड़े अस्पतालों की कतार में वापस धकेल रही है।

 

समय सुबह 9 बजे, स्टाफ की एंट्री अपनी मर्जी से!

 

आरोग्य मंदिर खोलने का समय सुबह 9 बजे निर्धारित है। लेकिन शिकायत यह है कि कई स्थानों पर स्टाफ समय पर नहीं पहुंचता। कहीं एक घंटे की देरी तो कहीं दो घंटे तक इंतजार। मरीज समय पर पहुंच जाता है, लेकिन इलाज देने वाली व्यवस्था समय पर नहीं पहुंचती।

 

यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि उस गरीब मरीज के समय और परेशानी के साथ खिलवाड़ है, जिसके लिए ये केंद्र बनाए गए हैं।

 

मेडिकल ऑफिसर नहीं, गंभीर मरीज जाएं तो जाएं कहां?

 

सबसे चिंताजनक स्थिति मेडिकल ऑफिसरों की कमी है। नर्स और टेक्नीशियन होने के बावजूद कई केंद्रों पर मेडिकल ऑफिसर उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर मरीज आने पर आगे का उपचार तय करने और उचित रेफरल की व्यवस्था भी प्रभावित होती है।

 

सवाल यह है कि जब सरकार ने स्वास्थ्य केंद्र खोल दिए तो डॉक्टरों की नियुक्ति और पर्याप्त स्टाफ की व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई?

 

दवाओं का भी टोटा

 

समस्या केवल डॉक्टरों और स्टाफ तक सीमित नहीं है। कई केंद्रों पर दवाओं की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मरीज इलाज के लिए पहुंचे और दवा भी उपलब्ध न हो, तो फिर ऐसे केंद्रों का उद्देश्य क्या रह जाता है?

 

10 केंद्रों के भवन तीन साल में भी नहीं!

 

63 केंद्रों की योजना के बावजूद 10 क्लीनिक अब तक भवन के अभाव में शुरू नहीं हो पाए। निर्माण की जिम्मेदारी नगर निगम की है, लेकिन वर्षों बाद भी इन केंद्रों के लिए जगह और भवन की समस्या बनी हुई है।

 

सरकारी फाइलों में योजना आगे बढ़ती रही और जमीन पर मरीज इलाज के लिए भटकता रहा।

 

उजला दर्पण का सवाल

 

आयुष्मान आरोग्य मंदिर खोल देना ही स्वास्थ्य सुविधा देना नहीं है।

 

जब डॉक्टर नहीं, मेडिकल ऑफिसर नहीं, स्टाफ समय पर नहीं और दवाओं की उपलब्धता भी सवालों में हो, तो फिर इन केंद्रों को ‘आरोग्य मंदिर’ कहने से पहले व्यवस्था को स्वस्थ करना जरूरी है।

 

जिम्मेदार अधिकारी बताएं—गरीब मरीज को इलाज देने की जिम्मेदारी किसकी है और डॉक्टरों की नियुक्ति में इतनी देरी के लिए जवाबदेह कौन है?

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