जयपुर। 25 जून। भारतीय संस्कृति में सेवा, दान और परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी मानव सेवा को ईश्वर सेवा के समान बताया गया है। इसी भावना को आत्मसात करते हुए जयपुर स्थित परमार्थम फाउंडेशन ने निर्जला एकादशी के पावन अवसर पर जनकल्याण और सेवा का एक प्रेरणादायक कार्यक्रम आयोजित किया। भीषण गर्मी के बीच राहगीरों, वाहन चालकों और आमजन को शीतल दूध ठंडाई एवं प्रसाद वितरित कर फाउंडेशन ने न केवल लोगों को राहत पहुंचाई, बल्कि समाज को सेवा और सद्भाव का संदेश भी दिया।

निर्जला एकादशी हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक मानी जाती है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आने वाला यह पर्व तप, त्याग, संयम और दान की महिमा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन किया गया दान और पुण्य कार्य विशेष फलदायी होता है। इसी आध्यात्मिक भावना से प्रेरित होकर परमार्थम फाउंडेशन ने इस अवसर को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रखते हुए जनसेवा के महापर्व के रूप में मनाया।
कार्यक्रम के दौरान फाउंडेशन के सदस्यों और स्वयंसेवकों ने शहर के प्रमुख स्थानों पर सेवा शिविर लगाकर राहगीरों को शीतल दूध ठंडाई, पेयजल एवं प्रसाद वितरित किया। दोपहर की तपती धूप और गर्म हवाओं के बीच यह सेवा कार्य लोगों के लिए किसी राहत से कम नहीं था। सेवा शिविर पर पहुंचने वाले नागरिकों ने ठंडाई ग्रहण कर राहत महसूस की और फाउंडेशन के इस प्रयास की सराहना की।
कार्यक्रम में शामिल स्वयंसेवकों का उत्साह देखने योग्य था। सभी ने पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ सेवा कार्य में भाग लिया। किसी ने ठंडाई तैयार करने में सहयोग दिया तो किसी ने वितरण व्यवस्था संभाली। कई स्वयंसेवक राह चलते लोगों को स्वयं बुलाकर उन्हें शीतल पेय और प्रसाद उपलब्ध कराते नजर आए। सेवा का यह भाव भारतीय संस्कृति के उस मूल मंत्र को चरितार्थ करता दिखाई दिया, जिसमें कहा गया है कि सच्चा धर्म वही है जो मानवता के कल्याण के लिए कार्य करे।
धार्मिक दृष्टि से भी निर्जला एकादशी का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन उपवास और दान करने से सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है। विशेष रूप से जलदान को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। गर्मी के इस मौसम में प्यासे व्यक्ति को पानी पिलाना और जरूरतमंदों की सहायता करना सर्वोच्च दान की श्रेणी में आता है। परमार्थम फाउंडेशन ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज के विभिन्न वर्गों तक सेवा पहुंचाने का प्रयास किया।

कार्यक्रम के दौरान अनेक स्थानीय नागरिकों ने भी इस सेवा अभियान में सहयोग किया। कई लोगों ने स्वयं आगे बढ़कर फाउंडेशन के सदस्यों का उत्साहवर्धन किया और इस प्रकार के कार्यक्रमों को समाज के लिए आवश्यक बताया। नागरिकों का कहना था कि आज के समय में जहां लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में व्यस्त रहते हैं, वहीं कुछ संस्थाएं समाज के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रही हैं, जो वास्तव में प्रेरणादायक है।
परमार्थम फाउंडेशन के सचिव पीयूष शर्मा ने इस अवसर पर कहा कि संस्था का उद्देश्य केवल सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि समाज में सेवा, सहयोग और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि निर्जला एकादशी का यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व का भी प्रतीक है। उन्होंने बताया कि फाउंडेशन भविष्य में भी इसी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक और जनकल्याणकारी कार्यक्रम निरंतर आयोजित करता रहेगा, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक सहायता और सेवा पहुंचाई जा सके।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में दान, सेवा और परोपकार को विशेष महत्व दिया गया है। जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करता है, तो वह केवल एक इंसान की मदद नहीं करता बल्कि पूरे समाज को सकारात्मक दिशा देने का कार्य करता है। इसी सोच के साथ परमार्थम फाउंडेशन लगातार समाजहित में कार्य कर रहा है।
इस अवसर पर श्री शुभकरण वर्मा ने भी पूरे उत्साह और समर्पण के साथ कार्यक्रम में भागीदारी निभाई। उन्होंने स्वयंसेवकों के साथ मिलकर सेवा कार्यों में सहयोग किया और लोगों को प्रसाद एवं ठंडाई वितरित की। उनका मानना है कि धार्मिक पर्व तभी सार्थक होते हैं, जब उनसे समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों को लाभ पहुंचे। उन्होंने कहा कि सेवा और मानवता का संदेश प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण दिखाई दिया। सेवा शिविर में आने वाले लोग न केवल ठंडाई और प्रसाद ग्रहण कर रहे थे, बल्कि संस्था के इस प्रयास की सराहना भी कर रहे थे। कई लोगों ने कहा कि ऐसे आयोजन समाज में आपसी भाईचारे, सहयोग और सद्भाव की भावना को मजबूत करते हैं।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब युवा और समाजसेवी संगठन मिलकर जनहित के कार्य करते हैं, तो समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और सहयोग की भावना विकसित होती है। यही कारण है कि सेवा कार्यों को केवल सामाजिक दायित्व नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम भी माना जाता है।
भारत की सनातन परंपरा में सेवा को साधना का सर्वोच्च स्वरूप बताया गया है। संत-महात्माओं ने भी सदैव यही संदेश दिया है कि ईश्वर की सच्ची पूजा मंदिरों में दीप जलाने से अधिक जरूरतमंदों की सहायता करने में निहित है। परमार्थम फाउंडेशन का यह आयोजन इसी विचारधारा को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करता है। संस्था ने यह संदेश दिया कि धार्मिक पर्व केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्वों को निभाने का भी समय है।
निर्जला एकादशी के इस विशेष अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ने यह साबित किया कि यदि सेवा का भाव सच्चा हो तो छोटे-छोटे प्रयास भी समाज में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। गर्मी से परेशान लोगों को राहत पहुंचाने का यह अभियान न केवल मानवीय संवेदनाओं का परिचायक था, बल्कि धार्मिक मूल्यों को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का उत्कृष्ट उदाहरण भी बना।
कार्यक्रम के समापन पर फाउंडेशन के सदस्यों ने समाज में सेवा और परोपकार की भावना को और अधिक व्यापक बनाने का संकल्प लिया। सभी स्वयंसेवकों ने भविष्य में भी इसी प्रकार के जनहितकारी कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
परमार्थम फाउंडेशन द्वारा आयोजित यह सेवा कार्यक्रम निस्संदेह समाज के लिए एक प्रेरणादायक पहल है। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता की सेवा, जरूरतमंदों की सहायता और समाज के कल्याण के लिए किए गए कार्यों में निहित है।
“सेवा ही परम धर्म है” — इस दिव्य संदेश को आत्मसात करते हुए परमार्थम फाउंडेशन ने निर्जला एकादशी को जनसेवा, करुणा, श्रद्धा और मानव कल्याण के महापर्व के रूप में मनाकर समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।











