मुस्कान से बदली बाजार की तस्वीर
जहां कभी राजस्व वसूली चुनौती थी, वहां संवाद, सद्भाव और अनुशासन से बाजार विभाग ने रचा बदलाव
बाजार विभाग अधीक्षक राजेंद्र दुबे की कार्यशैली बनी सकारात्मक प्रशासन का उदाहरण
जबलपुर।
कहते हैं कि व्यवस्था को बदलने के लिए सदैव कठोरता की आवश्यकता नहीं होती। कई बार मृदु व्यवहार, आत्मीय संवाद और अनुशासन का संयमित समन्वय वह कार्य कर जाता है, जो कठोरता और दबाव भी नहीं कर पाते। जब सामने वाला विरोध के लिए तैयार हो, तब मुस्कुराकर हाथ जोड़ देना कमजोरी नहीं, बल्कि अपने दायित्व और संस्थागत गरिमा पर दृढ़ विश्वास का परिचायक होता है।
जबलपुर नगर निगम के बाजार विभाग अधीक्षक श्री राजेंद्र दुबे की कार्यशैली को इसी दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।
उनके पदभार ग्रहण करने से पूर्व बाजार विभाग के समक्ष राजस्व वसूली और बकाया राशि की प्राप्ति को लेकर अनेक व्यावहारिक चुनौतियां थीं। बाजारों में निगम की दुकानों एवं अन्य राजस्व मदों से संबंधित बकायेदारों से राशि प्राप्त करना कई बार सहज प्रक्रिया नहीं रह जाता था। कुछ स्थानों पर कर्मचारी जब राजस्व वसूली के लिए पहुंचते, तो उन्हें प्रतिरोध और टालमटोल जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था।
लेकिन राजेंद्र दुबे ने इस चुनौती को टकराव का विषय बनाने के बजाय संवाद का सेतु बनाया।
उन्होंने पदभार संभालते ही किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखा। जो लोग राजस्व अथवा टैक्स जमा करने में आनाकानी करते थे, बड़े बकायेदार थे अथवा निगम की वसूली प्रक्रिया के प्रति सहज नहीं थे, उनसे भी उन्होंने हंसते-मुस्कुराते हुए, आत्मीयता के साथ और आवश्यकता पड़ने पर हाथ जोड़कर बात की।
उनकी कार्यशैली का मूल मंत्र मानो यही रहा—
“व्यक्ति से नहीं, समस्या से संघर्ष होना चाहिए।”
राजेंद्र दुबे ने बकायेदारों के साथ व्यवहार में सम्मान बनाए रखते हुए उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि निगम को दिया जाने वाला राजस्व किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था और नागरिक सुविधाओं के लिए सार्वजनिक संसाधन है। यही कारण रहा कि धीरे-धीरे बातचीत ने प्रतिरोध का स्थान लेना शुरू किया और समझाइश ने टकराव को पीछे छोड़ दिया।
इसका सकारात्मक प्रभाव बाजार विभाग की राजस्व व्यवस्था में भी दिखाई देने लगा। वसूली की प्रक्रिया में गति आई और निगम के राजस्व संग्रह को बढ़ाने की दिशा में विभाग की सक्रियता मजबूत हुई।
सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि वातावरण में आया।
जहां पहले वसूली को लेकर तनाव की स्थिति बन सकती थी, वहां संवाद का वातावरण तैयार हुआ। जहां कठोरता की आशंका रहती थी, वहां मुस्कान दिखाई देने लगी। और जहां पद की औपचारिक दूरी थी, वहां दायित्व की गरिमा के साथ मानवीय संबंधों की ऊष्मा दिखाई देने लगी।
यही राजेंद्र दुबे की कार्यशैली की विशिष्टता कही जा सकती है कि वे कार्यालय में अधिकारी हैं तो अधिकारी की जिम्मेदारी का निर्वहन पूरी गंभीरता से करते हैं और बाजार में किसी बकायेदार से मिलते हैं तो मानवीय गरिमा को सर्वोच्च स्थान देते हैं।
उनकी मुस्कान को कमजोरी समझने के बजाय यदि उनकी कार्यपद्धति को देखा जाए तो उसके पीछे एक स्पष्ट प्रशासनिक दर्शन दिखाई देता है—अनुशासन बना रहे, निगम का राजस्व सुरक्षित रहे और नागरिक के सम्मान को भी ठेस न पहुंचे।
यह आसान संतुलन नहीं है।
एक ओर निगम के राजस्व हितों की रक्षा करना और दूसरी ओर बकायेदार से बिना अनावश्यक कटुता के अपनी बात मनवाना—यह वही प्रशासनिक कौशल है, जिसमें कठोर लक्ष्य और कोमल व्यवहार का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।
आज बाजार विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर यह परिवर्तन इस बात की ओर संकेत करता है कि व्यवस्था केवल आदेशों से नहीं चलती, उसे विश्वास से भी संचालित किया जा सकता है।
राजेंद्र दुबे ने बाजार की इस कार्यशैली में मानो एक नया अध्याय जोड़ा है—
न दबाव, न दुराग्रह; न कटुता, न टकराव—बल्कि संवाद, सद्भाव और अनुशासन।
यही वह पद्धति है जिसमें प्रशासन की कठोर जिम्मेदारी भी निभती है और मानवीय संवेदना भी जीवित रहती है।
और शायद इसी कारण बाजार विभाग की यह कहानी केवल राजस्व वसूली की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि यह बताती है कि सच्चा अनुशासन भय से नहीं, विश्वास से भी स्थापित किया जा सकता है।
जहां मुस्कान रास्ता खोल दे,
वहां टकराव की आवश्यकता ही क्या है।
जहां संवाद से राजस्व आ जाए,
वहां कठोरता का औचित्य ही क्या है।
बाजार विभाग अधीक्षक श्री राजेंद्र दुबे की यही कार्यशैली आज बाजार व्यवस्था में एक सकारात्मक और अनुकरणीय संदेश देती दिखाई देती है—पद की गरिमा के साथ व्यवहार की विनम्र
ता और दायित्व की कठोरता के साथ संवेदना का संतुलन।










