न्यायालय के आदेश को ठेंगा, कुर्की वारंट लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे अधिवक्ता, ताला लगाने की आ गई नौबत
18 लाख का भुगतान दबाए बैठा रहा प्रशासन, कुर्की की आहट से मचा हड़कंप; 15 दिन को 15 कार्य दिवस बनाने की कोशिश भी अधिवक्ताओं ने पकड़ी
जबलपुर। आम आदमी अपने हक का पैसा पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है, लेकिन जब न्यायालय के आदेश के बाद भी भुगतान न हो तो सवाल सीधे प्रशासन की जवाबदेही पर खड़े होते हैं। जबलपुर कलेक्ट्रेट में बुधवार को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिजनों को मुआवजा देने के न्यायालयीन आदेश की अनदेखी इतनी भारी पड़ी कि कलेक्ट्रेट की संपत्ति कुर्क करने और कार्यालय में ताला लगाने तक की नौबत आ गई। कुर्की वारंट लेकर अधिवक्ता पहुंचे तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया।
18 लाख की देनदारी, फिर भी भुगतान में टालमटोल
मामला कोई छोटा-मोटा बकाया नहीं, बल्कि न्यायालय द्वारा निर्धारित मुआवजे का है। 12 लाख 93 हजार रुपये के मुआवजे पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज जुड़ते-जुड़ते देनदारी 18 लाख 3 हजार 262 रुपये तक पहुंच गई। न्यायालय ने भुगतान नहीं होने पर कलेक्ट्रेट की चल-अचल संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी कर दिया। सवाल यह है कि न्यायालय का आदेश आने के बाद भी भुगतान की फाइल आगे क्यों नहीं बढ़ी?
15 दिन का वादा, कागजों में 15 कार्य दिवस का खेल!
जब कुर्की की नौबत आई तो प्रशासन ने 15 दिन में भुगतान का भरोसा दिया। अधिवक्ताओं ने मौखिक आश्वासन मानने से इनकार कर लिखित आदेश मांगा। लेकिन लिखित आदेश में 15 दिन की जगह 15 कार्य दिवस दर्ज कर दिए गए। यानी छुट्टियों का हिसाब लगाकर भुगतान की समयसीमा बढ़ाने का रास्ता निकालने की कोशिश हुई। अधिवक्ताओं ने इस शब्दों के खेल को पकड़ लिया और साफ कह दिया कि 15 दिन का वादा चाहिए, 15 कार्य दिवस का नहीं।
एक अपर कलेक्टर, दो एसडीएम की मनुहार भी नहीं आई काम
अधिवक्ता अपनी मांग पर अड़े रहे। हालात ऐसे बने कि एक अपर कलेक्टर और दो एसडीएम को लगातार बातचीत कर उन्हें मनाना पड़ा। न्यायालय के नाजिर ने भी स्पष्ट कर दिया कि यदि दबाव में कुर्की की कार्रवाई रोकी गई तो इसकी सूचना न्यायालय को दी जाएगी। आखिरकार प्रशासन को लिखित आदेश बदलना पड़ा और 15 दिनों के भीतर भुगतान का आश्वासन देना पड़ा। इसके बाद ही कुर्की की कार्रवाई रुकी।
सरकारी बोलेरो की टक्कर से गई थी जान
पूरा मामला 7 अक्टूबर 2019 को कुंडम में हुए सड़क हादसे से जुड़ा है। एसडीएम कार्यालय की बोलेरो की टक्कर से नवाब खान की मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी नूरजहां, बेटे शब्बीर और बेटी मुस्कान ने मुआवजे के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। तीसवें अपर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 25 फरवरी 2025 को 12 लाख 93 हजार रुपये मुआवजे के साथ आवेदन की तारीख से सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। भुगतान में देरी के कारण राशि बढ़कर 18 लाख 3 हजार 262 रुपये हो गई।
अब सवालों के घेरे में प्रशासन की जवाबदेही
कलेक्ट्रेट पर ताला नहीं लगा, कुर्की भी फिलहाल टल गई, लेकिन इस घटनाक्रम ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर न्यायालय के आदेश का पालन कराने के लिए अधिवक्ताओं को कुर्की वारंट लेकर कलेक्ट्रेट क्यों पहुंचना पड़ा? पीड़ित परिवार को न्याय पाने के बाद भी अपने अधिकार की राशि के लिए इतनी लंबी प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ी? क्या सरकारी विभागों में न्यायालयीन आदेशों की भी कोई समयसीमा और जवाबदेही है?
अब प्रशासन ने 15 दिन में भुगतान का लिखित भरोसा दिया है। असली परीक्षा इस आश्वासन को पूरा करने की है। वरना अगली बार अधिवक्ता केवल चेतावनी देने नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेश का पालन कराने फिर कलेक्ट्रेट पहुंच सकते हैं।










