कलेक्टर महोदय जी, पहले रास्ता तो बनवाइए—फिर राखी मेले में व्यापार कराइए!
22 से 25 अगस्त तक महाकौशल संभागीय हाट बाजार में राखी मेला, लेकिन बदहाल रास्ते और अव्यवस्थाओं के बीच ग्राहक आएंगे कैसे?
जबलपुर। रक्षाबंधन के अवसर पर ग्रामीण महिलाओं के हुनर को बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 22 से 25 अगस्त तक रेल सौरभ कॉलोनी, कांचघर स्थित महाकौशल संभागीय हाट बाजार में चार दिवसीय राखी मेले का आयोजन प्रस्तावित है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की पहल पर महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा तैयार हस्तनिर्मित, स्वदेशी, ईको-फ्रेंडली, रेशम और मोती की राखियां यहां बिक्री के लिए उपलब्ध रहेंगी। खान-पान, झूले, गेम्स और मनोरंजन के स्टॉल भी लगाए जाने हैं।
लेकिन सवाल यह है कि मेले तक ग्राहक पहुंचेंगे कैसे?
कलेक्टर महोदय, मेले से पहले रास्ता तो देख लीजिए!
महाकौशल संभागीय हाट बाजार में व्यापार बढ़ाने और ग्रामीण महिलाओं को बाजार उपलब्ध कराने की योजना कागज पर आकर्षक दिखाई देती है, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग सवाल खड़े करती है। बाजार तक पहुंचने वाले रास्तों की हालत और परिसर की व्यवस्थाओं को लेकर यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो मेले में दुकानें तो सज जाएंगी, लेकिन ग्राहक कहां से आएंगे?
सड़क पर गड्ढे हों, आवागमन सुगम न हो और बाजार परिसर में मूलभूत व्यवस्थाएं दुरुस्त न हों तो व्यापार बढ़ाने की कवायद महज औपचारिकता बनकर रह सकती है।
राखियां बिकेंगी या व्यवस्था की पोल खुलेगी?
महिलाओं ने मेहनत से राखियां तैयार की हैं। स्व-सहायता समूहों की महिलाओं को अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिलना निश्चित रूप से अच्छी पहल है। लेकिन उनकी मेहनत का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब बाजार तक खरीदार आसानी से पहुंच सकें और उन्हें बेहतर वातावरण मिल सके।
प्रशासन यदि मेले को सफल बनाना चाहता है तो पहले रास्तों के गड्ढे भरवाने, सड़क की मरम्मत कराने, आवागमन सुचारु करने और बाजार परिसर में साफ-सफाई सहित आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने पर ध्यान देना होगा।
दिखावे का मेला नहीं, महिलाओं की मेहनत का बाजार चाहिए
मेले में रागी डोसा, इडली, अप्पे, सैंडविच, भेलपुरी, चाट, भजिया, स्वीट कॉर्न, मोमोज और चाय के स्टॉल से लेकर बच्चों के लिए झूले और गेम्स तक की व्यवस्था की जा रही है। लेकिन इन सबके बीच सबसे जरूरी चीज ग्राहक तक पहुंचने का सुगम रास्ता है।
कलेक्टर महोदय, पोस्टर और प्रचार से ग्राहक नहीं आते—सुविधाजनक सड़क और बेहतर व्यवस्था भी चाहिए। यदि प्रशासन वास्तव में ग्रामीण महिलाओं के हुनर को बाजार देना चाहता है, तो मेले के उद्घाटन से पहले रास्तों और हाट बाजार की बदहाल व्यवस्थाओं पर भी नजर डालनी होगी।
वरना चार दिन तक स्टॉल सजे रहेंगे, उद्घाटन की तस्वीरें भी खिंच जाएंगी और कागजों में मेला सफल भी घोषित हो जाएगा—लेकिन सवाल वही रहेगा कि जब ग्राहक पहुंचेंगे ही नहीं, तो महिलाओं का व्यापार होगा कैसे?
मेहनत महिलाओं की, बाजार सरकार का और रास्ता बदहाल—ऐसे में ‘समृद्धि’ का सपना आखिर पहुंचेगा कैसे?










