आरटीआई का दम तोड़ता लोकतंत्र: जबलपुर में लोक सूचना विभाग या ‘कागजी खानापूर्ति’ का अड्डा?
“मांगा जो हक तो मिला सिर्फ सन्नाटा, आरटीआई के दर पर हर आवेदक ने है खुद को ठगा सा बांटा!”
मध्य प्रदेश के संस्कारधानी जबलपुर में इन दिनों सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धज्जियां सरेआम उड़ाई जा रही हैं। जिस कानून को आम जनता का ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया था, जिसके बल पर एक आम नागरिक शासन-प्रशासन के गलियारों से सच बाहर निकलवाने की उम्मीद रखता था, आज वही कानून जबलपुर के लोक सूचना विभागों और प्रथम अपीलीय अधिकारियों की लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है।
क्या यह महज़ प्रशासनिक सुस्ती है या फिर किसी बड़े भ्रष्टाचार को छिपाने की सुनियोजित साजिश? यह सवाल आज हर उस नागरिक के जेहन में है, जो कानून के दायरे में रहकर सच जानना चाहता है।
कागजों पर ‘न्याय’, हकीकत में ‘शून्य’
जबलपुर के विभिन्न विभागों में इन दिनों एक अजीब और गरीब ‘खेल’ चल रहा है, जिसे पढ़कर शायद कानून के रखवाले भी हैरान रह जाएं। इस खेल के चरण कुछ इस प्रकार हैं:
- चरण 1 (आवेदन): एक जागरूक नागरिक पूरी उम्मीद और विश्वास के साथ आरटीआई के तहत आवेदन लगाता है। उसे लगता है कि लोकतंत्र में उसे सच जानने का पूरा अधिकार है।
- चरण 2 (तय समयसीमा का बीत जाना): तयशुदा 30 दिन का समय चुपचाप गुजर जाता है, लेकिन लोक सूचना अधिकारी (PIO) की तरफ से कोई जवाब नहीं आता। फाइलें या तो धूल फांकती हैं या फिर दबा दी जाती हैं।
- चरण 3 (प्रथम अपील और सुनवाई का नाटक): जब जानकारी नहीं मिलती, तो आवेदक प्रथम अपीलीय अधिकारी के दरबार में दस्तक देता है। अपील पर सुनवाई की तारीख तय होती है, दोनों पक्षों को बुलाया जाता है, कागजी खानापूर्ति की जाती है और आदेश भी हो जाते हैं—“आवेदक को जल्द से जल्द जानकारी उपलब्ध कराई जाए।”
- चरण 4 (नतीजा ढाक के तीन पात): आदेश की स्याही सूखती भी नहीं है कि विभाग उसे ठंडे बस्ते में डाल देता है। न जानकारी मिलती है, न कोई जवाब और न ही किसी अधिकारी के माथे पर शिकन!
उजला दर्पण’ की कोशिशें और सिस्टम की बहरी दीवारें
स्थानीय प्रिंट मीडिया, खासकर उजला दर्पण’ समाचार पत्र ने लगातार अपनी खबरों के माध्यम से इस व्यवस्था की पोल खोलने की पुरजोर कोशिश की। अखबार ने चीख-चीखकर प्रशासन को चेताया कि कैसे लोक सूचना विभाग के नाम पर आवेदकों को गुमराह किया जा रहा है।
बावजूद इसके, भ्रष्ट तंत्र के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। ऐसा लगता है कि विभागों ने यह मान लिया है कि वे जवाबदेह नहीं हैं। क्या मांगी गई जनहित की जानकारी को दबाना और छुपाना ही इन विभागों का मुख्य उद्देश्य बन गया है? क्या सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता की जगह ‘लपापोती’ संस्कृति ने ले ली है?
आयुक्त महोदय! आपकी सख्ती का इंतजार है
आयुक्त महोदय, आपकी कार्यशैली और त्वरित कार्रवाई की ख्याति पूरे प्रदेश में है। जब भी आप एक्शन लेते हैं, भ्रष्टाचारियों की नींद उड़ जाती है। आपकी सतर्कता और निष्पक्षता पर किसी को संदेह नहीं है, लेकिन जबलपुर के लोक सूचना विभागों में जो ‘नाटक’ चल रहा है, उस पर अब आपकी सीधी और कड़ी नजर की सख्त जरूरत है।
सवाल यह उठता है कि:
- प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेशों की अवहेलना करने वाले लापरवाह अधिकारियों पर तत्काल प्रभाव से आर्थिक दंड (शास्ति) क्यों नहीं लगाया जा रहा?
- सूचना छिपाने वालों को बचाने के लिए कौन सी अदृश्य शक्तियां काम कर रही हैं?
- क्या जबलपुर में आरटीआई अधिनियम महज कागजी पन्नों तक सिमट कर रह गया है?
अब चुप्पी तोड़नी होगी!
जबलपुर की जनता और मीडिया अब और खामोश बैठने वाले नहीं हैं। उजला दर्पण’ की यह तीखी कलम तब तक सवाल पूछती रहेगी जब तक इस सड़े-गले सिस्टम में सुधार नहीं आ जाता।
आयुक्त महोदय! जनता की उम्मीदों को यह लालफीताशाही यूं ही कुचलती रहे, इससे पहले कि विश्वास पूरी तरह टूट जाए, इस गड़बड़झाले पर अपनी पैनी नजर डालिए और एक ऐसा कड़ा संदेश दीजिए ताकि भविष्य में कोई भी विभाग आरटीआई के आवेदन को डस्टबिन में डालने की हिमाकत न कर सके।
सच को छिपाने की लाख कोशिश कर लो साहब,
आर.टी.आई. की एक चिंगारी ही काफी है, सारे राज उगलवाने के लिए!









