17 साल की सजा का हिसाब कौन देगा? दूसरे केस की FSL रिपोर्ट से दो भाइयों की जिंदगी तबाह

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17 साल की सजा का हिसाब कौन देगा? दूसरे केस की FSL रिपोर्ट से दो भाइयों की जिंदगी तबाह 

जिस सबूत पर टिकी थी उम्रकैद, वही निकला किसी और मामले का! हाईकोर्ट ने खोली जांच और अभियोजन की बड़ी पोल

जबलपुर। एक कागज गलत था या पूरी जांच? एक रिपोर्ट दूसरे मामले की थी या पूरी न्यायिक प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ गई? दमोह के वर्ष 2009 के हत्याकांड में हाईकोर्ट के फैसले के बाद ये सवाल अब जवाब मांग रहे हैं।

मामले में दो भाइयों को निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। दोनों ने वर्षों तक इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी। करीब 17 साल बाद हाईकोर्ट ने उनकी सजा निरस्त करते हुए दोनों को दोषमुक्त कर दिया।

सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि अभियोजन द्वारा महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में पेश की गई FSL रिपोर्ट उसी मामले की थी ही नहीं। वह किसी दूसरे आपराधिक प्रकरण से संबंधित थी।

तो 17 साल तक जांच कौन कर रहा था?

यह सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं कही जा सकती। सवाल है कि—

क्या जांच अधिकारी ने FSL रिपोर्ट पढ़ी थी?
क्या अभियोजन ने दस्तावेजों का सत्यापन किया था?
ट्रायल के दौरान इस गंभीर विसंगति पर ध्यान क्यों नहीं गया?
अगर रिपोर्ट दूसरे मामले की थी तो उसके आधार पर दो लोगों को दोषी कैसे ठहराया गया?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या हाईकोर्ट को यह गलती पहले नहीं दिखाई दे सकती थी?

यह कहना उचित नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने कोई गलती की, क्योंकि अपीलीय अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के बाद आखिरकार दोनों भाइयों को राहत दी। लेकिन यह सवाल जरूर है कि जिस गंभीर खामी को अपील के स्तर पर पकड़ा गया, वह निचली अदालत की पूरी प्रक्रिया में पहले क्यों नहीं पकड़ी गई?

सजा सिर्फ जेल की नहीं थी, जिंदगी की थी

उम्रकैद का मतलब सिर्फ जेल की सलाखें नहीं होतीं। इसके साथ परिवार, समाज, प्रतिष्ठा, रोजगार, रिश्ते और मानसिक संघर्ष भी जुड़े होते हैं।

यदि अंततः दोनों भाई दोषमुक्त हैं, तो सवाल सिर्फ यह नहीं कि उन्हें अब न्याय मिल गया।

सवाल यह है—

उनके 17 साल कौन लौटाएगा?
उनके परिवार को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
समाज में लगे आरोपों का दाग कौन मिटाएगा?
और ऐसी गंभीर जांच संबंधी चूक के लिए जवाबदेही किसकी तय होगी?

हाईकोर्ट ने सजा तो पलट दी, अब व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?

अदालत का फैसला दोनों भाइयों के लिए राहत है, लेकिन यह मामला आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी भी है।

एक गलत रिपोर्ट किसी फाइल की गलती नहीं होती—वह किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है।

इस मामले में अब सिर्फ दोषमुक्ति पर्याप्त नहीं होनी चाहिए। यह भी सामने आना चाहिए कि दूसरे मामले की FSL रिपोर्ट इस मुकदमे का हिस्सा कैसे बनी, किस स्तर पर इसकी जांच नहीं हुई और जिम्मेदारी किसकी थी।

क्योंकि अगर एक निर्दोष व्यक्ति को गलत साक्ष्य के आधार पर 17 साल तक न्याय के लिए लड़ना पड़े, तो सवाल केवल उस व्यक्ति का नहीं होता—

सवाल पूरी व्यवस्था से होता है।

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