पहली अर्जी फर्जी निकली, फिर नए तहसीलदार से नामांतरण की कोशिश; मझौली के बाद रांझी के तत्कालीन RI सुधीर सोनी पर भी सवाल

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पहली अर्जी फर्जी निकली, फिर नए तहसीलदार से नामांतरण की कोशिश; मझौली के बाद रांझी के तत्कालीन RI सुधीर सोनी पर भी सवाल

मझौली में रीडर सस्पेंड, लावारिस जमीन को सरकारी नाम दर्ज कराने की तैयारी; रांझी के पुराने मामले में EOW जांच लंबित होने का दावा, कलेक्टर से कार्रवाई की मांग

भास्कर प्रतिनिधि | जबलपुर

राजस्व रिकॉर्ड में जमीनों के नामांतरण की प्रक्रिया को लेकर एक के बाद एक सवाल खड़े हो रहे हैं। मझौली तहसील में ऐसा मामला सामने आया है, जहां पहली बार नामांतरण का आवेदन खारिज होने के बाद उसी जमीन के लिए दोबारा प्रकरण प्रस्तुत कर नामांतरण कराने की कोशिश की गई। मामला सामने आने पर तहसीलदार के रीडर सिद्धार्थ राय को निलंबित किया गया है। अब प्रशासन संबंधित जमीन को शासकीय हक में दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर रहा है।

इसी मामले के सामने आने के बाद रांझी तहसील के तत्कालीन राजस्व निरीक्षक सुधीर सोनी के कार्यकाल से जुड़े एक पुराने जमीन प्रकरण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस मामले में EOW की जांच लंबित है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि जांच अभी लंबित है तो उसकी वर्तमान स्थिति क्या है और अब तक जिम्मेदारी तय करने की दिशा में क्या कार्रवाई हुई?

पहली बार ही खारिज हो गया था नामांतरण

मझौली तहसील के ग्राम नरीला स्थित खसरा नंबर 159, रकबा 0.16 हेक्टेयर भूमि के नामांतरण के लिए अंकित जैन और संचित सोनी द्वारा तहसीलदार मझौली के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया था। तहसीलदार न्यायालय ने प्रकरण को खारिज कर दिया।

इसके बाद मामले की अपील एसडीएम सिहोरा के समक्ष प्रस्तुत की गई। एसडीएम सिहोरा ने 18 जून 2026 को अपील खारिज करते हुए तहसीलदार के आदेश को यथावत रखा।

यानी राजस्व न्यायालय के स्तर पर नामांतरण का दावा पहले ही खारिज हो चुका था।

तहसीलदार बदले तो फिर सामने आया प्रकरण

आरोप है कि तत्कालीन तहसीलदार के स्थानांतरण के बाद नए तहसीलदार की पदस्थापना होते ही उसी भूमि का नामांतरण प्रकरण नए सिरे से प्रस्तुत किया गया। इस दौरान पूर्व में खारिज किए गए प्रकरण और एसडीएम न्यायालय में हुई अपील की जानकारी नए न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जाने की बात सामने आई।

बाद में जब पूरा मामला सामने आया तो तहसीलदार मझौली ने नए आदेश को भी निरस्त कर दिया।

नोटिस का जवाब नहीं मिला, रीडर पर कार्रवाई

मामले में तहसीलदार द्वारा 19 अगस्त 2026 को रीडर सिद्धार्थ राय को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। बताया गया है कि नोटिस का जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बाद एसडीएम सिहोरा ने रीडर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की, जिसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया।

लावारिस जमीन को फर्जी तरीके से बेचने का आरोप

तहसीलदार जानकी उइके के अनुसार, जिस जमीन का नामांतरण विवाद सामने आया है, उसका पूर्व में किया गया विक्रय फर्जी तरीके से होने की बात सामने आई है। बताया गया कि भूमि स्वामी की मृत्यु हो चुकी है और उसका कोई वारिस नहीं है। इसके बावजूद प्रेमलाल नामक व्यक्ति द्वारा भूमि बेचने की बात सामने आई।

मामले में यह भी बताया गया कि राजस्व रिकॉर्ड में भूमि स्वामी का नाम भी प्रेमलाल ही दर्ज है। अब प्रशासन की ओर से एसडीएम को पत्र भेजकर भूमि को शासकीय हक में दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।

रांझी के सुधीर सोनी का मामला भी उठेगा?

मझौली के मामले में रीडर के खिलाफ कार्रवाई के बाद अब रांझी तहसील के तत्कालीन राजस्व निरीक्षक सुधीर सोनी के कार्यकाल से जुड़े पुराने मामले को लेकर भी प्रशासन से स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ रही है। आरोप है कि उनके कार्यकाल में जमीन के नामांतरण से संबंधित अनियमितता का मामला सामने आया था और इस संबंध में EOW जांच लंबित है।

हालांकि इस जांच में वर्तमान स्थिति और अब तक सामने आए निष्कर्षों को संबंधित जांच एजेंसी अथवा प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया जाना बाकी है। ऐसे में पूरे मामले में दस्तावेजी रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति सामने आना जरूरी है।

कलेक्टर से संज्ञान लेकर जांच की स्थिति स्पष्ट करने की मांग

मामले में कलेक्टर जबलपुर श्री राघवेंद्र सिंह से मांग की गई है कि रांझी तहसील के तत्कालीन राजस्व निरीक्षक सुधीर सोनी से जुड़े प्रकरण और लंबित EOW जांच का संज्ञान लिया जाए। संबंधित रिकॉर्ड और जांच की वर्तमान स्थिति की समीक्षा कराई जाए तथा यदि जांच में किसी अधिकारी की जिम्मेदारी अथवा अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

मझौली की घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब किसी जमीन का नामांतरण एक बार राजस्व न्यायालय से खारिज हो चुका हो और अपील भी खारिज हो चुकी हो, तो उसी जमीन का प्रकरण दोबारा नए सिरे से न्यायालय के सामने किस आधार पर पहुंच जाता है। ऐसे मामलों में राजस्व रिकॉर्ड और पूर्व आदेशों की जांच की व्यवस्था को और जवाबदेह बनाने की जरूरत सामने आती है।

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