कलेक्टर महोदय,  रैपिड एक्शन टीम बनी है, अब जरा जमीन पर उतरकर अस्पताल भी देख लीजिए

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कलेक्टर महोदय,  रैपिड एक्शन टीम बनी है, अब जरा जमीन पर उतरकर अस्पताल भी देख लीजिए

सीएमएचओ ने टीम तो बना दी, लेकिन संजीवनी आरोग्य केंद्रों में डॉक्टर-स्टाफ समय पर पहुंचते हैं या नहीं, दवाएं मिलती हैं या नहीं—इसकी भी एक बार औचक जांच हो जाए?

 

जबलपुर में मौसमी बीमारियों से निपटने के लिए सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी ने रैपिड एक्शन टीम गठित कर दी। बैठक हुई, अधिकारी बैठे, कार्ययोजना बनी और जिम्मेदारियां भी तय हो गईं। लेकिन क्या कभी इसी तेजी से टीम के अधिकारी जमीन पर उतरकर यह भी देखेंगे कि जिन स्वास्थ्य केंद्रों के भरोसे आम आदमी इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचता है, वहां डॉक्टर और स्टाफ समय पर मौजूद हैं या नहीं?

 

कलेक्टर महोदय, अब आपकी निगरानी की जरूरत है। एक बार बिना सूचना संजीवनी आरोग्य केंद्रों, सिविल डिस्पेंसरी और सरकारी अस्पतालों का औचक निरीक्षण करा दीजिए। सुबह निर्धारित समय पर स्वास्थ्य केंद्र खुलते हैं या नहीं, डॉक्टर समय पर पहुंचते हैं या नहीं, नर्सिंग स्टाफ और कर्मचारी ड्यूटी पर मिलते हैं या नहीं और मरीजों को जरूरी दवाइयां उपलब्ध होती हैं या नहीं—जमीन पर उतरकर एक बार यह हकीकत भी देख लीजिए।

 

क्योंकि सवाल सिर्फ मौसमी बीमारियों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसे इन बीमारियों में आम आदमी की पहली उम्मीद माना जाता है।

 

जब मरीज स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और डॉक्टर का इंतजार करे, स्टाफ का पता न हो और जरूरी दवा के लिए उसे बाहर मेडिकल स्टोर का रास्ता दिखा दिया जाए, तो फिर स्वास्थ्य विभाग की तमाम तैयारियां किस काम की?

 

सीएमएचओ साहब, रैपिड एक्शन टीम तो बना दी… लेकिन क्या कभी रैपिड निरीक्षण भी होगा?

 

क्या टीम सिर्फ बैठकों में समीक्षा करेगी या अचानक किसी संजीवनी आरोग्य केंद्र पहुंचकर यह भी पूछेगी—“डॉक्टर साहब, ड्यूटी का समय हो गया, आप अभी तक कहां थे?”

 

क्या यह भी जांचा जाएगा कि ड्यूटी पर दर्ज कर्मचारी वास्तव में केंद्र में मौजूद हैं या सिर्फ रजिस्टर में उनकी उपस्थिति पूरी है?

 

क्या दवाइयों का स्टॉक वास्तव में मरीजों के लिए उपलब्ध है या फिर स्टॉक रजिस्टर में दवाओं की भरमार और मरीज के हाथ में खाली पर्ची ही व्यवस्था की असली तस्वीर है?

 

कलेक्टर महोदय, एक बार औचक निरीक्षण हो जाए तो शायद कागज और जमीन का अंतर भी साफ दिखाई दे जाए।

 

रैपिड एक्शन टीम की असली परीक्षा प्रेस नोट, बैठक और फाइलों में नहीं, बल्कि सुबह निर्धारित समय पर किसी संजीवनी आरोग्य केंद्र के दरवाजे पर खड़े मरीज से पूछने में है कि डॉक्टर आए या नहीं?

 

अगर डॉक्टर और स्टाफ समय पर मौजूद मिलते हैं, दवाएं उपलब्ध मिलती हैं और मरीजों को उपचार मिलता है तो व्यवस्था को सलाम।

 

लेकिन यदि केंद्र खुला मिले, मरीज मौजूद मिलें और डॉक्टर-स्टाफ गायब मिले, तो फिर सवाल सीधा सीएमएचओ से होगा—रैपिड एक्शन टीम आखिर किसके खिलाफ और किसके लिए बनाई गई है?

बीमारी से लड़ने से पहले स्वास्थ्य व्यवस्था की इस लापरवाही से लड़ना जरूरी है। कलेक्टर महोदय, एक बार जमीन पर उतरकर जांच कर लीजिए—कहीं रैपिड एक्शन टीम कागजों में दौड़ तो नहीं रही और अस्पतालों में मरीज आज भी डॉक्टर का इंतजार तो नहीं कर रहे?

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