बेटे की गाड़ी पंचायत में अटैच, सरकारी खजाने से भुगतान; लोकायुक्त ने सचिव-सरपंच समेत तीन पर कसा शिकंजा
बिना टेंडर, बिना प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया और बिना ग्रामसभा की अनुमति वाहन पंचायत में लगाया, सरकारी निधि से किराया भुगतान का आरोप
इंदौर। पंचायत में पद और सरकारी निधि के कथित दुरुपयोग का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इंदौर लोकायुक्त ने ग्राम पंचायत बांक के तत्कालीन सचिव प्रहलाद नील, तत्कालीन सरपंच लक्ष्मीबाई चौहान और सचिव के बेटे धीरज नील के खिलाफ भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज किया है।
आरोप है कि तत्कालीन सचिव ने अपने ही बेटे के वाहन MP-10-G-1435 को पंचायत के कार्यों में बिना टेंडर और बिना किसी प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के अटैच कराया। इतना ही नहीं, आरोप है कि ग्रामसभा की अनुमति के बिना पंचायत निधि से वाहन का किराया भी सरकारी खजाने से चुकाया गया।
नियमों को ताक पर रखकर परिवार को लाभ पहुंचाने का आरोप
मामला केवल वाहन अटैच करने तक सीमित नहीं है। लोकायुक्त जांच में आरोप है कि पद का प्रभाव इस्तेमाल करते हुए सचिव के बेटे के वाहन को पंचायत के काम में लगाया गया और इसके एवज में पंचायत निधि से भुगतान कराया गया। यानी सवाल सीधा है—सरकारी पंचायत में निजी परिवार का वाहन किस प्रक्रिया के तहत लगाया गया और नियमों की मंजूरी आखिर कहां थी?
लोकायुक्त ने मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। अब दस्तावेजों, भुगतान प्रक्रिया, ग्रामसभा के प्रस्ताव और वाहन को पंचायत में अटैच करने की पूरी प्रक्रिया की जांच की जा रही है।
इंदौर में लोकायुक्त का डंडा चला, जबलपुर में कब?
इंदौर में पंचायत निधि और पद के कथित दुरुपयोग पर लोकायुक्त की कार्रवाई ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसी ही सख्ती जबलपुर जिले में भी दिखाई देगी? जिले में पंचायतों और राजस्व व्यवस्था से जुड़े भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यही है—
आखिर जबलपुर जिले के अंतर्गत सचिवों पर लोकायुक्त का डंडा कब पड़ेगा?










