पट्टे की जमीन का खेल: बिना अनुमति बिकती रही सरकारी जमीन, रिकॉर्ड में भी हुआ खेल
एसडीएम की जांच में नामांतरण अवैध, पुराने रिकॉर्ड में भी गड़बड़ी उजागर; कलेक्टर ने पट्टा और सभी नामांतरण किए निरस्त
जबलपुर
सरकारी जमीन के पट्टे को निजी संपत्ति समझकर बेचने और फिर राजस्व रिकॉर्ड में नाम चढ़वाने का मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। गोरखपुर अनुभाग के नयागांव स्थित खसरा नंबर 33/7/2 रकबा 0.3210 हेक्टेयर और 33/7/3 रकबा 1.7020 हेक्टेयर की भूमि का मामला सामने आया है। यह जमीन मूल रूप से शासन के नाम दर्ज थी। वर्ष 1978 में त्रिलोक सिंह के नाम पट्टा दर्ज हुआ, लेकिन बाद की जांच में इसी नाम की प्रविष्टि को ही अवैध पाया गया।
मामला यहीं नहीं रुका। भूमि पर अधिकार को लेकर राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होता रहा और अंततः जमीन का अंतरण भी कर दिया गया, जबकि कलेक्टर की अनुमति के बिना पट्टे की जमीन का विक्रय नियमानुसार संभव नहीं था। प्रशासनिक जांच में सामने आया कि जमीन के रिकॉर्ड में जिस तरह नाम दर्ज और संशोधित किए गए, उनमें भी गंभीर अनियमितताएं थीं।
तहसीलदार की समीक्षा में त्रिलोक सिंह का नाम अवैध रूप से दर्ज पाया गया। इसके बाद नायब तहसीलदार ने वर्ष 1992 में त्रिलोक सिंह का नाम भूमि से अलग करने का आदेश जारी किया। इस आदेश के खिलाफ एसडीएम के समक्ष अपील की गई, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली। बावजूद इसके भूमि का विवाद आगे बढ़ता रहा और अंततः मामला कलेक्टर न्यायालय तक पहुंचा।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कलेक्टर की अनुमति के बिना ही पट्टे की भूमि का अंतरण कर दिया गया। इसके बाद कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड में डॉ. संजय चौधरी और निरंजन कुमार के नाम दर्ज नामांतरणों को निरस्त करने के आदेश दिए हैं। साथ ही भूमि को पूर्ववत शासकीय मद में दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं।
सवाल यह कि रिकॉर्ड में खेल किस स्तर पर हुआ?
यह मामला केवल एक जमीन के नामांतरण को निरस्त करने तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जब भूमि का पुराना रिकॉर्ड प्रशासन के सामने मौजूद था और वर्ष 1992 में ही एक नाम को अवैध मानकर हटाने का आदेश जारी हो चुका था, तो इसके बाद भूमि के रिकॉर्ड में नए नाम कैसे दर्ज होते गए?
क्या राजस्व रिकॉर्ड की जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रही? या फिर किसी स्तर पर नियमों को नजरअंदाज कर जमीन को निजी हाथों में पहुंचाने का रास्ता बनाया गया?
प्रशासन द्वारा अब नामांतरण निरस्त कर भूमि को सरकारी मद में वापस दर्ज करने का आदेश इस पूरे मामले की गंभीरता को खुद बयां करता है।
पहले भी सामने आया था पट्टे की जमीन का खेल
ऐसा ही एक अन्य मामला बरेला क्षेत्र में भी सामने आ चुका है, जहां पट्टे की जमीन को कथित रूप से दो बार बेचने का मामला सामने आया था। नामांतरण की प्रक्रिया शुरू होने पर मूल भू-स्वामी को इसकी जानकारी हुई और उसने एसडीएम न्यायालय में आपत्ति दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान जमीन के पट्टे की होने और उसके विक्रय के लिए आवश्यक कलेक्टर अनुमति नहीं लिए जाने की बात सामने आई।
इसके बाद प्रशासनिक न्यायालय ने रजिस्ट्री और नामांतरण निरस्त कर भूमि को सरकारी मद में दर्ज कराने के आदेश दिए। मामले में एफआईआर की प्रक्रिया भी शुरू की गई।
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने राजस्व रिकॉर्ड की निगरानी और पट्टे की जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन सिर्फ नामांतरण निरस्त करने तक कार्रवाई सीमित रखता है या उन लोगों की जिम्मेदारी भी तय करता है, जिनकी भूमिका के चलते सरकारी जमीन निजी सौदों तक पहुंची।










