क्या कलेक्टर महोदय 74 वर्षीय बुजुर्ग के टूटते विश्वास को बचा पाएंगे,  मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के बीच रांझी तहसील की कार्यप्रणाली पर सवाल, सालों से भटक रहा बुजुर्ग

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क्या कलेक्टर महोदय 74 वर्षीय बुजुर्ग के टूटते विश्वास को बचा पाएंगे,  मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के बीच रांझी तहसील की कार्यप्रणाली पर सवाल, सालों से भटक रहा बुजुर्ग

जबलपुर। एक ओर जिले में मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के तहत शासन-प्रशासन आम नागरिकों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याओं का मौके पर निराकरण करने का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर रांझी तहसील का एक 74 वर्षीय बुजुर्ग वर्षों से अपनी समस्या के समाधान के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। सवाल यह है कि जब उम्र के इस पड़ाव पर भी उसे न्याय और समाधान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, तो फिर जनविश्वास अभियान आखिर किसके लिए है?

 

बताया जाता है कि बुजुर्ग द्वारा अपनी समस्या को लेकर कई बार सीएम हेल्पलाइन में शिकायत की गई, जनसुनवाई में गुहार लगाई गई और संबंधित अधिकारियों तक मामला पहुंचाया गया, लेकिन इसके बावजूद समस्या का स्थायी निराकरण नहीं हो सका। शिकायतें दर्ज होती रहीं, कार्रवाई की उम्मीद बंधती रही और बुजुर्ग समाधान की आस में कार्यालयों की चौखट पर भटकता रहा।

 

सबसे बड़ा सवाल रांझी तहसील के आरआई, तहसीलदार, पटवारी और एसडीएम की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है। आखिर एक 74 वर्षीय व्यक्ति की समस्या ऐसी क्या है, जिसका समाधान वर्षों में नहीं हो सका? क्या विभागीय अधिकारी समस्या समझ नहीं पा रहे हैं या फिर समाधान के बजाय कागजी कार्रवाई और नई उलझनें खड़ी की जा रही हैं?

 

अधिकारियों को सूचना, फिर भी नहीं बदली तस्वीर

मामले की जानकारी एडीएम रवि शंकर राय और एडीएम शैलेंद्र सिंह तक भी पहुंचाए जाने की बात सामने आ रही है। इसके बावजूद बुजुर्ग का भटकना जारी है। ऐसे में सवाल सिर्फ एक बुजुर्ग की समस्या का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था का है, जो शिकायत सुनने और उसके निराकरण के बीच कहीं अटकती दिखाई दे रही है।

 

क्या बुजुर्ग के दम तोड़ने के बाद होगा निराकरण?

 

सबसे कड़ा सवाल यही है—क्या प्रशासन उस बुजुर्ग की समस्या का समाधान तब करेगा, जब वह दफ्तरों की चौखट पर भटकते-भटकते दम तोड़ देगा?

 

सरकार मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के जरिए जनता और प्रशासन के बीच विश्वास मजबूत करने की बात कर रही है। लेकिन रांझी तहसील का यह मामला उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर अभियान में ‘समाधान संवाद’ हो रहा है, दूसरी ओर एक बुजुर्ग वर्षों से समाधान की तलाश में भटक रहा है।

जबलपुर में टूटता दिख रहा ‘जनविश्वास’

मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान का उद्देश्य ही तब सार्थक होगा, जब शिकायतकर्ता को सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि वास्तविक समाधान मिले। रांझी का यह मामला यदि सही है, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

अब निगाहें कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह पर हैं। सवाल सीधा है—क्या कलेक्टर महोदय 74 वर्षीय बुजुर्ग के टूटते विश्वास को बचा पाएंगे? या फिर मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान भी केवल कागजों, बैठकों और फोटो तक सीमित होकर रह जाएगा?

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