रिश्वत की ‘रेट लिस्ट’ में फंसी कुर्सी: शिवपुरी में SDM और पटवारी पर EOW का शिकंजा, वॉयस रिकॉर्डिंग बनी सबसे बड़ा सबूत”

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शिवपुरी। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच एक और बड़ा मामला सामने आया है। इस बार आरोप किसी छोटे कर्मचारी पर नहीं, बल्कि शिवपुरी जिले की पोहरी तहसील के एसडीएम जे.पी. गुप्ता और पटवारी अशोक वर्मा पर लगे हैं। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ग्वालियर ने दोनों के खिलाफ रिश्वत मांगने के आरोप में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

मामले की शुरुआत शिवपुरी के वार्ड क्रमांक-1 निवासी गोविंद शिवहरे की शिकायत से हुई। गोविंद ने EOW को बताया कि उसने रघुनाथपुरा गांव की भूमि खरीदने के लिए बाबू सिंह राजपूत से अनुबंध किया था और एक लाख रुपये अग्रिम भी दे दिए थे। लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में नाम की त्रुटि होने के कारण रजिस्ट्री अटक गई।

शिकायत के अनुसार, जब नाम सुधार के लिए एसडीएम कार्यालय में आवेदन दिया गया, तो एसडीएम जे.पी. गुप्ता ने पटवारी अशोक वर्मा के माध्यम से 10 हजार रुपये रिश्वत की मांग की।

वॉयस रिकॉर्डिंग ने खोली पोल

EOW ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पहले सत्यापन कराया। फरियादी को एक वॉयस रिकॉर्डर दिया गया, जिसमें रिश्वत मांगने से जुड़ी बातचीत रिकॉर्ड की गई। जांच में रिकॉर्डिंग प्रथम दृष्टया सही पाए जाने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धारा-7 के तहत एसडीएम और पटवारी के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया गया है। अब मामले की विस्तृत जांच जारी है।

भ्रष्टाचार पर सवाल बरकरार

प्रदेश में लगभग हर दूसरे दिन लोकायुक्त और EOW की कार्रवाई में कोई न कोई अधिकारी या कर्मचारी रिश्वत लेते या मांगते पकड़ा जा रहा है। इसके बावजूद सरकारी दफ्तरों में “काम के बदले रकम” की संस्कृति खत्म होती नहीं दिख रही। यह मामला भी बताता है कि आम नागरिक को अपने वैध कार्य के लिए भी कथित तौर पर रिश्वत की मांग का सामना करना पड़ रहा है।

दो दिन पहले रतलाम का हेड कॉन्स्टेबल भी फंसा था

गौरतलब है कि हाल ही में रतलाम के औद्योगिक क्षेत्र थाने में पदस्थ हेड कॉन्स्टेबल तपेश गोसाई को राजस्थान के भीलवाड़ा में EOW ने रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था। उस पर कानूनी कार्रवाई में राहत दिलाने और प्रताड़ना से बचाने के नाम पर रिश्वत लेने के आरोप लगे थे।

लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी पर प्रभावी अंकुश कब लगेगा, और आम नागरिक बिना ‘नजराने’ के अपना वैध काम कब करा सकेगा?

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