जनविश्वास अभियान या राजस्व दफ्तर का ‘चक्कर अभियान’?

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जनविश्वास अभियान या राजस्व दफ्तर का ‘चक्कर अभियान’?

नामांतरण से सीमांकन तक जनता परेशान, फाइलें दौड़ रही हैं… लेकिन काम नहीं!

जबलपुर। मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान में अधिकारी गांव-गांव पहुंचकर जनता की समस्याएं सुन रहे हैं। जनता भी अपनी शिकायतों की गठरी लेकर पहुंच रही है। लेकिन शिकायतों का हाल देखकर लगता है कि राजस्व विभाग में ‘जनविश्वास’ से ज्यादा ‘जन-इंतजार’ मजबूत है।

नामांतरण चाहिए तो चक्कर लगाइए, सीमांकन चाहिए तो चक्कर लगाइए और खसरा-खतौनी में गलती सुधरवानी हो तो फिर चक्कर लगाइए। फाइल की रफ्तार भले कछुए जैसी हो, लेकिन आवेदक के चक्कर लगाने की रफ्तार जरूर तेज हो जाती है।

रजिस्ट्री हो गई, नाम नहीं हुआ—अब ओटीपी के भरोसे मालिकाना हक!

लोगों की शिकायत है कि जमीन की रजिस्ट्री कराने के बाद भी नामांतरण के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। ऑनलाइन आवेदन के बावजूद नाम खसरे में दिखाई नहीं देता। ऊपर से सभी हिस्सेदारों की ओटीपी नहीं आई तो मामला फिर अटक गया।

यानी जमीन आपकी, रजिस्ट्री आपकी, पैसा आपका… लेकिन रिकॉर्ड में नाम आएगा या नहीं, इसका फैसला सिस्टम और ओटीपी करेंगे!

सीमांकन के लिए आवेदन, फिर शुरू होता है ‘सीमा का इंतजार’

सीमांकन के आवेदन भी लंबे समय से लंबित हैं। कहीं पड़ोसी से विवाद है तो कहीं अतिक्रमण की शिकायत। दस्तावेज हाथ में लेकर आवेदक घूम रहा है, लेकिन कार्रवाई की सीमा जैसे खुद सीमांकन से बाहर हो गई है।

खसरा-खतौनी में गलती सुधरवाना बना ‘महाभारत’

कहीं गलत नाम, कहीं गलत रकबा और कहीं वर्षों पुराने रिकॉर्ड। डिजिटलाइजेशन के दौर में भी रिकॉर्ड अपडेट नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। कुछ मामलों में तो लोगों का आरोप है कि असली मालिक का नाम गायब हो गया या रिकॉर्ड में गलत तरीके से बदलाव हो गया।

डिजिटल इंडिया में रिकॉर्ड डिजिटल जरूर हो गया, लेकिन गलती सुधारने की प्रक्रिया अभी भी ‘पुराने जमाने’ की चाल चल रही है।

तहसील में फाइलें अटकीं, आवेदक चक्कर काटते रहे

पटवारी हलकों में उपस्थिति और कामकाज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। तहसील स्तर पर फाइलें अटकने की शिकायतें हैं। आवेदकों का कहना है कि कई बार चक्कर लगाने के बाद भी कोई ठोस समाधान नहीं मिलता। हर बार कोई नया बहाना सामने आ जाता है।

समय-सीमा तय हो तो जनता को मिले राहत

आवेदकों की सबसे बड़ी मांग यही है कि नामांतरण, सीमांकन और अन्य राजस्व कार्यों के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय हो। अधिकारियों की कार्यालय में उपलब्धता का समय भी निर्धारित किया जाए, ताकि जनता अपनी जमीन का काम कराने के लिए सरकारी दफ्तरों की परिक्रमा करने को मजबूर न हो।

फिलहाल हालात ऐसे हैं कि जनविश्वास अभियान में जनता अपनी समस्या लेकर पहुंच रही है, लेकिन राजस्व व्यवस्था से उसका भरोसा ही सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

सवाल सीधा है—जब काम ऑनलाइन है, रिकॉर्ड डिजिटल है और सरकार जनविश्वास की बात कर रही है, तो फिर जनता को एक छोटे से राजस्व काम के लिए इतने चक्कर क्यों लगाने पड़ रहे हैं?

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