कमिश्नर साहब, बारिश तो चली गई… डिवाइडर के पौधे आखिर गए कहाँ?

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कमिश्नर साहब, बारिश तो चली गई… डिवाइडर के पौधे आखिर गए कहाँ?

दमोह नाका से दीनदयाल के बीच लगाए गए पौधों की हरियाली पर जनता का सीधा सवाल—सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च हुए लाखों का हिसाब कौन देगा?

 

जबलपुर।

नगर के सौंदर्यीकरण और हरियाली की बातें जब योजनाओं और अभियानों में गूंजती हैं, तो उम्मीद होती है कि शहर की सड़कों के किनारे भी उसका असर दिखाई देगा। लेकिन दमोह नाका से दीनदयाल की ओर जाने वाले मार्ग के डिवाइडर को देखकर एक सवाल बार-बार सामने आता है—बारिश से पहले लगाए गए वे पौधे आखिर गए कहाँ?

 

करीब तीन-चार महीने पहले, गर्मी के मौसम में, इन डिवाइडरों पर बड़ी संख्या में पौधारोपण किया गया था। समय भी ऐसा चुना गया था कि आने वाली बारिश पौधों के लिए जीवनदायिनी बनेगी, पौधे जड़ पकड़ेंगे और कुछ ही महीनों में डिवाइडर हरियाली से भर उठेंगे।

 

लेकिन बारिश गुजर गई।

 

हरियाली नजर नहीं आई।

 

अब जनता पूछ रही है—जो पौधे लगाए गए थे, उनका हिसाब किसके पास है?

 

पौधे लगाए थे या सिर्फ फोटो खिंचवाने की औपचारिकता थी?

 

यदि पौधे लगाए गए थे तो उनकी संख्या कितनी थी?

किस नर्सरी से पौधे खरीदे गए?

किस एजेंसी या ठेकेदार ने पौधे लगाए?

उनकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी थी?

कितने पौधे जीवित बचे?

और यदि पौधे सूख गए या नष्ट हो गए, तो उनकी जगह दोबारा पौधारोपण क्यों नहीं हुआ?

 

सबसे बड़ा सवाल—जनता के पैसे से लगाए गए पौधों की सुरक्षा और सिंचाई की व्यवस्था किसने सुनिश्चित की?

 

एक पेड़ मां के नाम… और डिवाइडर पूछ रहा अपना नाम

 

एक तरफ शहर में बड़े-बड़े पौधारोपण अभियानों के संकल्प लिए जा रहे हैं। एक पेड़ मां के नाम, हजारों पौधे, लाखों पौधे और हरित शहर की बातें हो रही हैं। दूसरी तरफ शहर के प्रमुख मार्ग का डिवाइडर खुद अपनी हरियाली का इंतजार कर रहा है।

 

ऐसे में सवाल संख्या का नहीं, नियत और निगरानी का है।

 

पौधा लगाना पहला कदम है, उसे पेड़ बनने तक बचाना असली जिम्मेदारी।

 

कमिश्नर साहब, एक बार मौके पर जाकर देखिए

 

नगर निगम आयुक्त श्री राम प्रकाश अहिरवार से जनता का सीधा और सरल आग्रह है कि कभी दमोह नाका से दीनदयाल की ओर जाते हुए इन डिवाइडरों पर एक नजर डालिए।

 

बारिश से पहले लगाए गए पौधों की स्थिति स्वयं देखिए और यह भी जानिए कि पौधारोपण की फाइल में दर्ज संख्या और जमीन पर दिखाई देने वाली हरियाली में कितना अंतर है।

 

क्योंकि जनता यह जानना चाहती है—

 

पौधे सूखे तो क्यों?

बचे नहीं तो किसकी जिम्मेदारी?

देखरेख नहीं हुई तो क्यों?

और अगर पौधे लगाए ही गए थे, तो आज डिवाइडर पर उनकी निशानी तक क्यों नहीं है?

 

शहर को हरियाली चाहिए, कागजों की हरियाली नहीं।

 

पौधारोपण किसी अभियान का अंत नहीं, उसकी शुरुआत है।

एक पौधा लगाकर तस्वीर खिंचवाना आसान है, उसे बचाकर पेड़ बनाना असली परीक्षा है।

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