ठेकेदार की रिपोर्ट के भरोसे पास हो रहीं करोड़ों की सड़कें?
नगर निगम जबलपुर की कोर कटिंग जांच व्यवस्था पर सवाल, मौके पर अधिकारियों की मौजूदगी को लेकर उठी आपत्तियां
जबलपुर। शहर में हर साल करोड़ों रुपए की लागत से सड़क निर्माण और डामरीकरण के काम कराए जाते हैं। लेकिन बारिश शुरू होते ही कई नई सड़कों की गुणवत्ता सवालों के घेरे में आ जाती है। कहीं सड़क की ऊपरी परत उखड़ने लगती है तो कहीं गिट्टियां बाहर निकल आती हैं। ऐसे में अब सड़क निर्माण के बाद होने वाली गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सड़क निर्माण की गुणवत्ता जांच में कोर कटिंग टेस्ट महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इसके तहत सड़क से निर्धारित स्थानों पर सैंपल निकालकर उसकी मोटाई, डामर और निर्माण सामग्री सहित तकनीकी मानकों की जांच कराई जाती है। इसी रिपोर्ट के आधार पर निर्माण की गुणवत्ता का आकलन और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
मौके पर जांच या सिर्फ कागजी प्रक्रिया?
निर्माण कार्य से जुड़े कुछ लोगों और निगम के कुछ तकनीकी कर्मचारियों के अनुसार कई मामलों में कोर कटिंग के दौरान निगम के अधिकारियों की मौके पर मौजूदगी को लेकर सवाल हैं। आरोप है कि ठेकेदार की ओर से सैंपल लैब भेजकर प्राप्त रिपोर्ट निगम में प्रस्तुत कर दी जाती है और उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई होती है।
यदि यह व्यवस्था वास्तव में इसी तरह संचालित हो रही है तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि सैंपल किस स्थान से लिया गया, किस अधिकारी की मौजूदगी में लिया गया और सैंपल की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड किस स्तर पर सुरक्षित रखा जाता है?
मोटाई और सामग्री की जांच पर भी नजर
सड़क की मजबूती के लिए निर्धारित डिजाइन और तकनीकी मानकों के अनुसार अलग-अलग लेयर की मोटाई तथा निर्माण सामग्री की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। सड़क निर्धारित मोटाई से कम होने या बिटुमिन एवं गिट्टी की गुणवत्ता में कमी होने पर उसकी टिकाऊ क्षमता प्रभावित हो सकती है।
निर्माण से जुड़े जानकारों का कहना है कि सिर्फ लैब रिपोर्ट पर्याप्त नहीं है। रिपोर्ट के साथ मौके की वास्तविक स्थिति का सत्यापन भी जरूरी है। यदि कागजों में सड़क मानकों के अनुरूप दिखाई दे और कुछ समय बाद सड़क खराब होने लगे तो संबंधित सड़क की दोबारा तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए।
पुरानी व्यवस्था में मौके पर रहते थे अधिकारी
एक सेवानिवृत्त कार्यपालन यंत्री के अनुसार पहले कोर कटिंग के दौरान निगम के तकनीकी अधिकारी मौके पर मौजूद रहते थे। सैंपल लिए जाने की प्रक्रिया का रिकॉर्ड और फोटो-वीडियो भी रखे जाते थे। उनका कहना है कि इससे सैंपल की वास्तविकता और प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में मदद मिलती थी।
हालांकि वर्तमान व्यवस्था में ऐसी निगरानी कितनी नियमित है, यह निगम के रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए।
सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, करोड़ों के भुगतान का भी
बारिश में सड़क खराब होने के बाद आम नागरिक के सामने सवाल सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का नहीं रहता, बल्कि यह भी उठता है कि जिस सड़क को तकनीकी रूप से सही पाए जाने के बाद भुगतान किया गया, वह इतनी जल्दी खराब कैसे हो गई।
ऐसे में प्रत्येक बड़े सड़क निर्माण कार्य में कोर कटिंग की तारीख, स्थान, सैंपल की संख्या, मौके पर मौजूद अधिकारी, फोटो-वीडियो रिकॉर्ड और लैब रिपोर्ट को सार्वजनिक अथवा रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज करने की व्यवस्था जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
अब देखना यह है कि नगर निगम सड़क निर्माण की गुणवत्ता जांच को लेकर उठ रहे इन सवालों पर क्या तकनीकी रिकॉर्ड सामने रखता है और क्या यह स्पष्ट करता है कि करोड़ों रुपए के सड़क कार्यों का भुगतान सिर्फ रिपोर्ट के आधार पर हुआ या वास्तविक फील्ड वेरिफिकेशन भी किया गया।










