सरकारी संपत्ति पर ‘पट्टा खेल’! आयुक्त अहिरवार की सख्ती से खुला मामला
टैक्स कलेक्टर पर मां के नाम 30 साल का पट्टा कराने का आरोप, निगमायुक्त ने संपत्ति कब्जे में ली; नोटिस से मचा हड़कम्प
जबलपुर।
नगर निगम की सरकारी संपत्ति पर कथित फर्जीवाड़े का ऐसा मामला सामने आया है, जिसने निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह रही कि निगमायुक्त रामप्रकाश अहिरवार ने शिकायत या विवाद के बढ़ने का इंतजार नहीं किया, बल्कि गोपनीय जांच कराकर सरकारी संपत्ति को तत्काल निगम के आधिपत्य में ले लिया।
मामला निगम के संभाग क्रमांक-15 में पदस्थ टैक्स कलेक्टर राजेश डेनियल से जुड़ा है। आरोप है कि निगम स्वामित्व की लाखों रुपए कीमत की संपत्ति का 30 वर्ष का पट्टा अपनी मां मरियम पीटर के नाम आवंटित करा लिया गया। बाद में संबंधित भवन को भी तोड़े जाने की जानकारी सामने आई।
जैसे ही निगम प्रशासन को इसकी जानकारी मिली, आयुक्त अहिरवार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कराई। जांच के बाद गुरुवार को निगम ने संपत्ति अपने आधिपत्य में ले ली। टैक्स कलेक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा गया है।
आयुक्त ने कार्रवाई को सिर्फ नोटिस तक नहीं रोका
इस मामले में आयुक्त अहिरवार की कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने इसे महज विभागीय जांच तक सीमित नहीं रखा। अवैध पट्टा निरस्त कराने के लिए कलेक्टर को पत्र और आपराधिक जांच के लिए पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजा गया है।
यानी निगमायुक्त ने साफ संकेत दिया है कि सरकारी संपत्ति से खिलवाड़ करने वाला व्यक्ति चाहे निगम का कर्मचारी ही क्यों न हो, कार्रवाई से बच नहीं सकता।
निगम की जमीन, फिर निजी नाम पर पट्टा कैसे?
मामला कछपुरा संभाग के शाहीनाका-संजीवनी नगर मेन रोड स्थित निगम स्वामित्व वाले पूर्व चुंगी नाका भवन का है। यहां कुछ वर्ष पहले स्वास्थ्य विभाग का कार्यालय संचालित होता था। बाद में टैक्स कलेक्टर राजेश डेनियल ने पत्राचार के माध्यम से इसे अपने निवास के नाम पर आवंटित कराया था।
हाल ही में भवन तोड़े जाने की जानकारी सामने आने के बाद निगम प्रशासन ने पड़ताल शुरू की। जांच में सामने आया कि 57 वर्गमीटर की निगम स्वामित्व वाली संपत्ति का 30 वर्ष का पट्टा टैक्स कलेक्टर की मां के नाम आवंटित हुआ।
अब असली सवाल यहीं से शुरू होता है—
जब संपत्ति नगर निगम की थी, तो उसका पट्टा निजी व्यक्ति के नाम कैसे हुआ? पट्टा जारी करने से पहले किन दस्तावेजों की जांच हुई? किस अधिकारी ने अनुमति दी? और पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन शामिल था?
इन सवालों का जवाब जिला प्रशासन की जांच में सामने आएगा।
आयुक्त की सख्ती से कई चेहरों पर चिंता की लकीरें
सरकारी संपत्ति के इस मामले में आयुक्त की त्वरित कार्रवाई के बाद निगम और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। यदि जांच का दायरा बढ़ाया जाता है तो यह भी पता चल सकता है कि क्या सरकारी संपत्तियों से जुड़े ऐसे अन्य मामले भी हैं, जिनमें नियमों को दरकिनार कर निजी हित साधने की कोशिश हुई?
फिलहाल आयुक्त अहिरवार ने जिस तरह मामले को संज्ञान में लेकर संपत्ति वापस निगम के आधिपत्य में ली और विभागीय कार्रवाई के साथ प्रशासनिक व आपराधिक जांच की दिशा में कदम बढ़ाया है, उससे यह संदेश स्पष्ट है—
‘निगम की संपत्ति पर किसी की निजी नजर बर्दाश्त नहीं होगी।’
अब जांच की रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट सामने आने के बाद यह साफ होगा कि कथित पट्टा किस प्रक्रिया के तहत हुआ और इसमें यदि किसी स्तर पर मिलीभगत या नियमों की अनदेखी हुई तो जिम्मेदार कौन-कौन हैं।










