मैं हूँ जोन क्रमांक-2 का शताब्दीपुरम। नाम मेरा “शताब्दी” है, लेकिन हालात ऐसे हैं मानो वर्षों से किसी ने मेरी सुध ही न ली हो। शहर में स्वच्छता के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, पुरस्कारों की चर्चा होती है, रैंकिंग की होड़ मचती है, पर मेरी गलियाँ आज भी उसी प्रश्न के साथ खड़ी हैं—क्या मैं जबलपुर शहर का हिस्सा नहीं हूँ?
मेरी सड़कों के किनारे कचरे के ढेर हैं, नालियाँ गंदगी से बजबजा रही हैं। वर्षा ऋतु ने दस्तक दे दी है और अब यही गंदगी मच्छरों की फैक्ट्री बन चुकी है। बदबू, जलभराव और बीमारी का भय यहाँ रहने वाले हर परिवार की नियति बनता जा रहा है। लगता है मानो स्वच्छता अभियान के कदम मेरी चौखट तक आते-आते थक जाते हैं।
सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि यहाँ स्वच्छता निरीक्षक और सहायक स्वच्छता निरीक्षक के दर्शन भी किसी दुर्लभ ग्रहण की तरह होते हैं। यदि कभी उनकी कृपा-दृष्टि पड़ भी जाए तो निरीक्षण समाप्त होते ही व्यवस्था फिर वहीं लौट आती है जहाँ से चली थी। ऐसा प्रतीत होता है कि निरीक्षण का उद्देश्य समस्या का समाधान नहीं, बल्कि औपचारिकता निभाना भर रह गया है।
विडंबना देखिए, सरकारी आवासीय परिसर होने के बावजूद यहाँ सफाई व्यवस्था सबसे अधिक उपेक्षित दिखाई देती है। मानो सरकारी भवनों की जिम्मेदारी भी केवल कागज़ों तक सीमित रह गई हो। स्वच्छता के नाम पर फोटो, बैठकें और दावे तो बहुत हैं, लेकिन धरातल पर गंदगी अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद है।
आयुक्त महोदय श्री रामप्रकाश अहिरवार जी से विनम्र निवेदन है कि यदि वास्तव में जबलपुर को स्वच्छता में उच्च स्थान दिलाना है, तो एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए। केवल 10 दिनों के लिए सभी स्वच्छता निरीक्षकों, सहायक स्वच्छता निरीक्षकों और संबंधित कर्मचारियों की चारपहिया वाहनों की सुविधा बंद कर दीजिए। उन्हें दोपहिया वाहन अथवा पैदल अपने-अपने क्षेत्रों का नियमित भ्रमण करने का निर्देश दीजिए।
विश्वास मानिए, जिन गलियों की धूल आज उनकी नजरों से ओझल है, वही धूल उनके जूतों पर लगेगी तो समस्याएँ भी दिखाई देने लगेंगी। जिन नालियों की दुर्गंध आज फाइलों में दर्ज नहीं होती, वह वास्तविक निरीक्षण में स्वयं शिकायत बनकर सामने आ जाएगी। दस दिनों के भीतर ही सफाई व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन दिखाई देगा, जिसे किसी रिपोर्ट या प्रस्तुति की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
स्वच्छता केवल मशीनों, वाहनों और बैठकों से नहीं आती; वह जिम्मेदारी, सतत निगरानी और जमीनी उपस्थिति से आती है। जब अधिकारी स्वयं गलियों में उतरेंगे, तब कर्मचारियों की जवाबदेही भी स्वतः तय होगी और नागरिकों का विश्वास भी लौटेगा।
शताब्दीपुरम आज भी आशा लगाए बैठा है कि कोई उसकी पुकार सुनेगा। क्योंकि स्वच्छ शहर की पहचान केवल मुख्य मार्गों से नहीं, बल्कि उन बस्तियों और आवासीय परिसरों से होती है जहाँ आम नागरिक प्रतिदिन अपना जीवन जीता है। यदि शताब्दीपुरम मुस्कुराएगा, तभी वास्तव में जबलपुर स्वच्छ कहलाएगा।










