जबलपुर। एक ओर भीषण गर्मी और जल संकट से जूझती जनता बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है, तो दूसरी ओर नगर निगम की व्यवस्था सवालों के घेरे में खड़ी नजर आ रही है। निगम की फाइलों में पानी सप्लाई के लिए टैंकरों की लंबी सूची दर्ज है, जरूरत पड़ने पर निजी टैंकर और ट्रैक्टर किराए पर लेने के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई वार्डों में जनता आज भी पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है।
रांझी सहित शहर के अनेक इलाकों में जल संकट गहराता जा रहा है। लोगों का आरोप है कि टैंकरों की संख्या कागजों में तो भरपूर दिखाई देती है, लेकिन फील्ड में वे नजर नहीं आते। आखिर ये टैंकर कहां जा रहे हैं? यदि टैंकर चल रहे हैं तो पानी लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा? और यदि नहीं चल रहे हैं तो फिर फाइलों में दर्ज आंकड़ों का सच क्या है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नगर निगम स्वयं स्वीकार करता है कि पानी की कमी है, तब वैकल्पिक जलापूर्ति व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं दिखाई दे रही? लाखों रुपये खर्च कर टैंकरों की व्यवस्था का दावा करने वाले जिम्मेदार अधिकारी क्या कभी उन वार्डों तक पहुंचे हैं, जहां महिलाएं और बुजुर्ग पानी के लिए घंटों इंतजार करने को मजबूर हैं?
शहर की प्यास बढ़ती जा रही है, लेकिन जवाबदेही कहीं नजर नहीं आ रही। अब समय आ गया है कि नगर निगम टैंकर संचालन की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे, यह बताए कि कितने टैंकर वास्तव में फील्ड में चल रहे हैं और किस वार्ड में कितनी जलापूर्ति की जा रही है। क्योंकि सवाल सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और उसके मूल अधिकार का है।
जबलपुर प्यासा है, जनता परेशान है, लेकिन व्यवस्था के जिम्मेदार आखिर कब जागेंगे?










