सतना स्टेशन बना कबाड़ियों का अड्डा, कमिश्नर नगर निगम की खामोशी पर उठे सवाल

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सतना स्टेशन बना कबाड़ियों का अड्डा, कमिश्नर नगर निगम की खामोशी पर उठे सवाल

सतना। रेलवे स्टेशन परिसर का खाली प्लॉट कबाड़ियों के अवैध कब्जे में है, जहां प्लास्टिक की बोतलों का अंबार लगा है। सालों से चल रहे इस अवैध कारोबार पर न कोई रोक, न टोक—और सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि नगर निगम के कमिश्नर इस पर पूरी तरह खामोश हैं।

यह कोई छिपी हुई जगह नहीं है, शहर के बीचोंबीच है। स्टेशन से चंद कदमों की दूरी पर प्लास्टिक के ढेर लगे हैं। एक चिंगारी और पूरा इलाका आग की भेंट चढ़ सकता है। फिर भी कमिश्नर आंखें बंद किए बैठे हैं।

क्या कमिश्नर किसी हादसे के इंतजार में हैं?
सवाल ये है कि नगर निगम कमिश्नर को ये सब दिखाई क्यों नहीं दे रहा? क्या वो मौके का मुआयना कभी करते नहीं या जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं? जनता पूछ रही है—कबाड़ का ये साम्राज्य आखिर किसकी छत्रछाया में पनप रहा है?

नगर निगम की चुप्पी, लापरवाही नहीं—संभावित मिलीभगत की गूंज
रेलवे की जमीन पर कब्जा, प्लास्टिक का डंपिंग ज़ोन, गंदगी का अंबार, और पास ही घना बाजार—फिर भी कोई फायर सेफ्टी, कोई सफाई, कोई सख्त कार्रवाई नहीं। क्या ये महज़ अनदेखी है या फिर कोई ‘समझदारी’?

कमिश्नर से सीधा सवाल—अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
सालों से चल रही इस गड़बड़ी पर कार्रवाई न होना खुद एक सवाल बन गया है। कमिश्नर बताएं—क्यों चुप हैं? क्यों आज तक न नोटिस, न चेतावनी, न बुलडोज़र?

अगर आम आदमी एक ठेला लगा दे तो हटा दिया जाता है, फिर कबाड़ी कैसे महफूज़ हैं?
ये दोहरे मापदंड क्यों? क्या सतना नगर निगम सिर्फ कमजोरों पर सख्ती दिखाता है? ताकतवर कबाड़ी क्यों बख्शे जा रहे हैं?

सतना जाग चुका है, अब जवाब चाहिए।
कमिश्नर को अब सामने आकर जवाब देना होगा। क्योंकि अगर अब भी चुप्पी रही, तो अगली चुप्पी शायद किसी हादसे की होगी।

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