जच्चा-बच्चा की मौत, कार्रवाई सिर्फ नर्सों पर

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जच्चा-बच्चा की मौत, कार्रवाई सिर्फ नर्सों पर?

रीवा मेडिकल कॉलेज में उठे गंभीर सवाल—वरिष्ठ डॉक्टर की भूमिका जांच के घेरे में, आखिर बड़े पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही कब तय होगी?

 

रीवा। श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में जच्चा और नवजात की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन की कार्रवाई पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। दो जिंदगियां चली गईं, लेकिन कार्रवाई का शिकंजा फिलहाल नर्सों तक सिमटता नजर आ रहा है। दूसरी ओर वरिष्ठ चिकित्सक की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप जांच के इंतजार में हैं।

 

परिजनों का आरोप है कि कल्पना मिश्रा के ऑपरेशन के दौरान वरिष्ठ चिकित्सक मौके पर मौजूद नहीं थे और पीजी छात्रों के भरोसे ऑपरेशन कराया गया। संबंधित डॉक्टर के ड्यूटी पर होने के बावजूद मौजूद नहीं रहने तथा उसी समय निजी अस्पताल में सेवा देने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आरोप गंभीर हैं, इसलिए इनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

 

सवाल सीधा है—जिम्मेदारी सिर्फ नर्सों की थी?

 

अगर ऑपरेशन में वरिष्ठ चिकित्सकीय निगरानी जरूरी थी, तो वह कहां थी?

 

अगर डॉक्टर ड्यूटी पर थे, तो वे मौके पर क्यों नहीं थे?

 

अगर निजी अस्पताल में सेवा देने का आरोप है, तो इसकी जांच कौन करेगा?

 

और सबसे बड़ा सवाल—जच्चा और बच्चे की मौत के बाद जिम्मेदारी तय करने में छोटे कर्मचारी ही सबसे आसान निशाना क्यों बनते हैं?

 

चार घंटे की बैठक और फिर नर्सों पर कार्रवाई

 

घटना के बाद परिजनों ने हंगामा किया। करीब चार घंटे बाद डीन, अधीक्षक और विधायक की बैठक हुई। इसके बाद दो नर्सों पर कार्रवाई की जानकारी सामने आई और वरिष्ठ डॉक्टर की भूमिका जांच के लिए कमेटी की बात कही गई।

 

यानी निचले स्तर पर तत्काल कार्रवाई, ऊपर के स्तर पर जांच!

 

यही अंतर अब सवाल बन गया है।

 

मेडिकल रिकॉर्ड में कथित छेड़छाड़ हुई तो मामला और गंभीर

 

परिजनों ने मेडिकल रिकॉर्ड में कथित फेरबदल के आरोप भी लगाए हैं। यदि यह सच साबित होता है तो सवाल केवल इलाज की लापरवाही का नहीं रहेगा, बल्कि साक्ष्यों को प्रभावित करने की आशंका तक पहुंच जाएगा।

 

इसलिए मूल मेडिकल फाइल, ऑपरेशन नोट, ड्यूटी रोस्टर, बायोमेट्रिक/अटेंडेंस रिकॉर्ड और ओटी के सीसीटीवी फुटेज को तत्काल सुरक्षित कर जांच में शामिल किया जाना चाहिए।

 

पुरानी घटना भी क्यों न खोली जाए?

 

दिसंबर में गायनी विभाग की ओटी में आग और नवजात की मौत के मामले में भी डॉ. सोनल अग्रवाल की भूमिका को लेकर सवाल उठने के आरोप सामने आए थे। यदि उस समय कोई जांच या शिकायत हुई थी तो उसका परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ? वर्तमान घटना के संदर्भ में पुराने मामले की फाइल भी जांच के दायरे में क्यों न लाई जाए?

 

अब लीपापोती नहीं, जवाब चाहिए

यह मामला किसी एक कर्मचारी को बलि का बकरा बनाने का नहीं है। सवाल जवाबदेही की समान कसौटी का है।

जच्चा गई। बच्चा गया।

अब जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

नर्सों पर कार्रवाई आसान है, लेकिन यदि वरिष्ठ स्तर पर भी चूक हुई है तो वहां तक जांच का हाथ पहुंचना चाहिए।

रीवा पूछ रहा है—क्या मेडिकल कॉलेज में जिम्मेदारी पद देखकर तय होती है?

जांच निष्पक्ष होगी तो सच सामने आएगा।

वरना दो मौतों के बाद एक और फाइल बंद हो जाएगी।

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