खून का रंग एक, फिर जाति का सवाल क्यों?
रीवा के SGMH ब्लड बैंक के आरोपों ने उठाया संवेदनशील सवाल—क्या रक्त की भी कोई जाति होती है?
रीवा।
खून का रंग लाल होता है—न वह ब्राह्मण होता है, न वैश्य, न पांडे, न किसी और जाति का। वह शरीर में बहता है तो केवल जीवन बनकर बहता है। मगर जब इसी खून के रास्ते में जाति, पहचान और सामाजिक पूर्वाग्रह की दीवार खड़ी होने की बात सामने आए, तो सवाल केवल एक मरीज का नहीं रह जाता, सवाल पूरी व्यवस्था की संवेदनशीलता पर उठ खड़ा होता है।
रीवा के संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल (SGMH) के ब्लड बैंक से जुड़ा एक मामला इसी विडंबना को सामने लाता है। सीधी निवासी बैजनाथ वैश्य ने आरोप लगाया है कि उनकी बीमार भांजी के लिए जब उनके मित्र जितेंद्र पांडे रक्तदान करने पहुंचे तो कथित तौर पर उनसे कहा गया—“वैश्य को पांडे का खून नहीं चढ़ेगा, परिवार का व्यक्ति लेकर आओ।”
अगर वास्तव में ऐसा कहा गया है, तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जिसमें इंसान से पहले उसकी जाति दिखाई देने लगती है। और इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि जिस जगह खून जीवन बचाने के लिए जमा किया जाता है, वहीं किसी के मन में जाति का जहर जगह बना ले?
पहले 18 साल की उम्र, फिर जाति का सवाल!
परिजनों के मुताबिक डॉक्टरों ने युवती को रक्त चढ़ाने की जरूरत बताई। परिवार के एक 16 वर्षीय सदस्य से रक्तदान कराने की बात सामने आई, लेकिन उम्र 18 वर्ष से कम होने के कारण उसका रक्त नहीं लिया गया। इसके बाद परिवार ने अपने परिचित जितेंद्र पांडे को बुलाया, जो रक्तदान के लिए तैयार थे।
यहीं से मामला विवाद में बदल गया।
परिजनों ने इसे जातिगत भेदभाव के रूप में देखा और आपत्ति जताई। सवाल स्वाभाविक है—यदि रक्त सुरक्षित है, रक्तदाता पात्र है और चिकित्सकीय मानकों पर रक्त स्वीकार्य है, तो फिर रक्तदाता की जाति का रक्त से क्या संबंध?
और यदि रक्तदाता चिकित्सकीय कारणों से उपयुक्त नहीं था, तो मरीज के परिजनों को स्पष्ट, सम्मानजनक और वैज्ञानिक भाषा में यही बात बताना व्यवस्था की जिम्मेदारी थी।
ब्लड बैंक में खून की जांच होनी चाहिए, जाति की नहीं
इस पूरे मामले में ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. लोकेंद्र त्रिपाठी ने जातिगत भेदभाव के आरोप से इनकार किया है। उनका कहना है कि ब्लड बैंक में मरीज या रक्तदाता की जाति और धर्म के आधार पर न तो रक्त लिया जाता है और न ही चढ़ाया जाता है।
प्रारंभिक जांच में संबंधित डोनर को “हाई रिस्क” श्रेणी में पाए जाने के कारण रक्त नहीं लेने की बात सामने आई है। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि कर्मचारियों की ओर से परिजनों को कारण समझाने में कमी रह गई।
यही बात इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
क्योंकि अस्पताल में किसी व्यक्ति को रक्त क्यों नहीं दिया जा सकता, इसका जवाब चिकित्सा विज्ञान देगा—जाति नहीं।
रक्तदाता का रक्त क्यों स्वीकार नहीं किया गया, इसका जवाब मेडिकल प्रोटोकॉल देगा—सरनेम नहीं।
और मरीज की जान बचाने के लिए कौन-सा रक्त सुरक्षित है, इसका निर्णय डॉक्टर और निर्धारित चिकित्सकीय जांच करेंगी—समाज की जातिगत धारणाएं नहीं।
जाति का जहर इतना गहरा है कि कभी-कभी शब्द भी जहर बन जाते हैं
भारत ने विज्ञान में इतनी प्रगति की है कि एक इंसान का रक्त दूसरे इंसान की जान बचा सकता है। लेकिन यदि उसी समाज में किसी को यह महसूस होने लगे कि उसका खून किसी दूसरी जाति के व्यक्ति के शरीर में नहीं जा सकता, तो समस्या केवल अस्पताल की दीवारों के भीतर नहीं है।
यह उस सोच की समस्या है जिसमें जन्म से मिली पहचान को इंसान की सबसे बड़ी पहचान मान लिया जाता है।
व्यंग्य देखिए—
रक्त की जांच में हीमोग्लोबिन देखा जाता है, रक्त समूह देखा जाता है, संक्रमण देखा जाता है; जाति का कॉलम तो मेडिकल रिपोर्ट में होता ही नहीं।
फिर समाज में यह कॉलम आखिर आता कहां से है?
किसी फॉर्म से नहीं,
किसी लैब रिपोर्ट से नहीं,
किसी मेडिकल मशीन से नहीं—
यह हमारे भीतर से आता है।
और यही सबसे खतरनाक बात है।
खून की बोतल पर सरनेम नहीं लिखा होता
जिस रक्त की एक बोतल किसी अनजान व्यक्ति की जिंदगी बचा सकती है, उस बोतल पर यह नहीं लिखा होता कि रक्तदाता किस जाति का था। उसमें किसी का उपनाम नहीं बहता, उसमें केवल जीवन बहता है।
इसलिए इस मामले की सच्चाई जो भी हो, जांच का केंद्र स्पष्ट होना चाहिए—क्या रक्तदाता को वास्तव में चिकित्सकीय कारणों से “हाई रिस्क” श्रेणी में रखा गया था? क्या निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार रक्त लेने से इनकार किया गया? और क्या मरीज के परिजनों को इसकी सही जानकारी दी गई?
यदि मेडिकल कारण था, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए और गलतफहमी दूर करनी चाहिए।
यदि संवाद में कमी थी, तो उसे स्वीकार कर सुधारना चाहिए।
और यदि जांच में कभी जातिगत भेदभाव का कोई प्रमाण सामने आता है, तो वह और भी गंभीर विषय होगा।
क्योंकि अस्पताल वह जगह है जहां आदमी अपनी जाति, धर्म, भाषा और पहचान से पहले मरीज होता है।
अंततः सवाल एक ही है—खून किसका था?
पांडे का?
वैश्य का?
या फिर एक इंसान का?
विज्ञान कहता है—रक्त की पहचान उसका समूह और उसकी चिकित्सकीय उपयुक्तता है।
समाज को भी शायद यही सीखने की जरूरत है कि इंसान की पहचान उसके नाम और जाति से पहले उसकी इंसानियत है।
क्योंकि जिस दिन अस्पताल के ब्लड बैंक में रखी हर बोतल को केवल “खून” समझा जाएगा, उस दिन शायद समाज के भीतर जमा जाति का जहर भी थोड़ा कम होगा।
खून का रंग लाल है—इसे लाल ही रहने दीजिए, इसमें जाति का रंग मत मिलाइए।










