दौसा। युगद्रष्टा, महान चिंतक और युवा चेतना के प्रतीक स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर श्यालावास केंद्रीय कारागृह, दौसा में सोमवार को एक विशेष एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य कारागृह में निरुद्ध बंदियों के व्यक्तित्व विकास, आत्ममंथन और सकारात्मक जीवन परिवर्तन को प्रोत्साहित करना रहा। कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद के जीवन दर्शन, उनके विचारों और आत्मबल के संदेशों को केंद्र में रखते हुए विभिन्न रचनात्मक एवं प्रेरक गतिविधियां आयोजित की गईं।

जेल अधीक्षक पारस जांगिड़ ने जानकारी देते हुए बताया कि कारागृह केवल दंड का स्थान नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्वास और नई दिशा देने का केंद्र भी है। इसी सोच के साथ स्वामी विवेकानंद जयंती को कारागृह में एक प्रेरणा दिवस के रूप में मनाया गया, ताकि बंदियों को अपने भीतर छिपी सकारात्मक ऊर्जा को पहचानने और समाज की मुख्यधारा में लौटने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा सके।
प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता से हुई कार्यक्रम की शुरुआत:
कार्यक्रम की शुरुआत स्वामी विवेकानंद के जीवन, विचारों और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान पर आधारित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता से हुई। इस प्रतियोगिता में बंदियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और विवेकानंद के आदर्शों, उनके शिकागो भाषण, युवाओं के प्रति उनके संदेश तथा आत्मविश्वास पर आधारित विचारों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर दिए।
इस गतिविधि का उद्देश्य बंदियों में ज्ञानवर्धन के साथ-साथ आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करना था, जिससे वे अपने जीवन की दिशा पर पुनर्विचार कर सकें।
‘स्वावलंबन दौड़’ बनी आत्मनिर्भरता का प्रतीक:
प्रश्नोत्तरी के पश्चात बंदियों द्वारा ‘स्वावलंबन दौड़’ का आयोजन किया गया। यह दौड़ केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, निरंतर प्रयास और संघर्ष से लक्ष्य प्राप्ति के संदेश का प्रतीक रही।
दौड़ में भाग लेते हुए बंदियों ने यह संदेश दिया कि जीवन की कठिन परिस्थितियों के बावजूद यदि व्यक्ति स्वयं पर विश्वास रखे और निरंतर प्रयास करता रहे, तो परिवर्तन संभव है।

सैंड आर्ट के माध्यम से आत्मपरिवर्तन का संदेश:
कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक और प्रभावशाली क्षण वह रहा, जब सभी बंदियों ने बंदी राजेश शर्मा द्वारा तैयार की गई स्वामी विवेकानंद की भव्य सैंड आर्ट कलाकृति के समक्ष एकत्र होकर अपराध छोड़ने और सकारात्मक जीवन अपनाने की शपथ ली।
रेत से निर्मित यह कलाकृति न केवल एक कला प्रस्तुति थी, बल्कि यह जीवन की क्षणभंगुरता और परिवर्तन की संभावना का प्रतीक भी बनी।
इस अवसर पर बंदियों को स्वामी विवेकानंद के अमर वाक्य—
“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रुको”
का गहन अर्थ समझाया गया। उन्हें बताया गया कि यह संदेश केवल युवाओं के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है, जो अपने जीवन में नई शुरुआत करना चाहता है।
परंपरागत खेलों से अनुशासन और टीम भावना का विकास:
कार्यक्रम के अंतर्गत परंपरागत खेलों एवं सामूहिक गतिविधियों का भी आयोजन किया गया। इन खेलों के माध्यम से बंदियों में अनुशासन, सहयोग, टीम भावना और सौहार्द का विकास करने का प्रयास किया गया।
कारागृह प्रशासन का मानना है कि इस प्रकार की गतिविधियां बंदियों के मानसिक तनाव को कम करने और उन्हें सामाजिक मूल्यों से जोड़ने में सहायक सिद्ध होती हैं।
जेल अधीक्षक का संदेश – कारागृह सुधार का केंद्र :
जेल अधीक्षक पारस जांगिड़ ने अपने संबोधन में कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा—
“इस प्रकार के आयोजन बंदियों के मानसिक परिवर्तन, आत्मविश्वास और पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कारागृह का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाकर समाज में पुनः स्थापित करना भी है।”
उन्होंने आगे कहा कि स्वामी विवेकानंद के आदर्श बंदियों को यह विश्वास दिलाते हैं कि भूतकाल की गलतियों के बावजूद भविष्य को सुधारा जा सकता है, बशर्ते व्यक्ति आत्मचिंतन और संकल्प के मार्ग पर चले।

अधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस प्रेरणादायी आयोजन में कारागृह प्रशासन के कई अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे, जिनमें जेलर रामचंद्र, डिप्टी जेलर दिलावर खान, मुख्य आरक्षी अभयेंद्र कुमार यादव, मुख्य प्रहरी रामजीवन कटानिया, राम प्रसाद सहित अन्य स्टाफ सदस्य शामिल थे। सभी ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे बंदियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
नई शुरुआत की ओर एक सशक्त प्रयास:
कुल मिलाकर, श्यालावास केंद्रीय कारागृह में स्वामी विवेकानंद जयंती के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह आत्मपरिवर्तन, आशा और नई शुरुआत का प्रतीक बनकर सामने आया।
ऐसे आयोजनों के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर आया कि यदि सही मार्गदर्शन, प्रेरणा और अवसर मिले, तो हर व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।
स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रेरित यह पहल निश्चय ही बंदियों को अपराधमुक्त, आत्मनिर्भर और सकारात्मक जीवन की ओर अग्रसर होने का संबल प्रदान करेगी।








