जबलपुर का भाग्य या दुर्भाग्य? ईमानदार अफसरों पर सियासत का शिकंजा!
जबलपुर का यह भाग्य कहें या दुर्भाग्य कि जो अधिकारी व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश करता है, वही सबसे पहले राजनीति के निशाने पर आ जाता है। सिस्टम की विडंबना यही है—जो ईमानदारी से काम करे, नियमों की बात करे और जवाबदेही तय करे, उसके लिए साजिशों की पटकथा जल्दी लिखी जाती है।
जबलपुर ही नहीं, पूरे प्रशासनिक ढांचे की यह पुरानी विडंबना रही है कि जो अधिकारी नियम-कायदे की किताब खोलकर काम करना चाहता है, उसे अक्सर राजनीति की किताब में उलझा दिया जाता है। विभागों में जब तक सब कुछ ढर्रे पर चलता रहे, फाइलें धीरे सरकती रहें, जिम्मेदारियां इधर-उधर टलती रहें, तब तक सब शांत रहता है। लेकिन जैसे ही कोई अधिकारी सख्ती दिखाता है, जवाबदेही तय करता है और काम में गति लाने की कोशिश करता है, अचानक माहौल बदलने लगता है।
मंत्री, नेताओं और स्थानीय राजनीतिक प्रभावों का दखल कई विभागों में इस कदर गहराया हुआ है कि प्रशासनिक निर्णय भी कई बार राजनीतिक तराजू में तौले जाने लगते हैं। यह स्थिति केवल व्यवस्था को कमजोर नहीं करती, बल्कि उन अधिकारियों के मनोबल पर भी चोट करती है जो अपने पद की शपथ के अनुसार काम करना चाहते हैं।
जब कोई अधिकारी विभाग में अनुशासन लागू करता है, कर्मचारियों की उपस्थिति जांचता है, कार्यप्रणाली की समीक्षा करता है, लापरवाही पर कार्रवाई करता है, तो यह कदम आम जनता के हित में होते हैं। लेकिन विभागों में वर्षों से जमी ढिलाई और “जैसे चल रहा है वैसे चलने दो” वाली मानसिकता को यह सख्ती रास नहीं आती। ऐसे में धीरे-धीरे विरोध शुरू होता है—कभी अंदरखाने, कभी शिकायतों के जरिए, तो कभी राजनीतिक संरक्षण के सहारे।
यही वह दौर होता है जहां विभागों में “डेरा-डफली” का खेल शुरू होता है। कुछ लोग अपने-अपने खेमे बना लेते हैं, कुछ राजनीतिक संरक्षण तलाशते हैं, और कुछ अधिकारी की छवि पर सवाल उठाने लगते हैं। काम का मुद्दा पीछे छूट जाता है और केंद्र में आ जाता है विवाद।
Arvind Shah जैसे मामलों ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि क्या प्रशासनिक सख्ती अब राजनीतिक असहजता का कारण बनती जा रही है? यदि कोई अधिकारी ईमानदारी से शहर सुधारने, परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और जवाबदेही तय करने की कोशिश करता है, तो क्या उसके खिलाफ माहौल बनाना आसान हथियार बन चुका है?
जनता की नजर से देखें तो उन्हें न राजनीति चाहिए, न विभागीय गुटबाजी। जनता को सड़क चाहिए, सफाई चाहिए, विकास चाहिए और पारदर्शिता चाहिए। लेकिन जब विभागों में काम की जगह शक्ति प्रदर्शन और प्रभाव की राजनीति हावी हो जाती है, तब नुकसान सीधे जनता को उठाना पड़ता है।
यह भी सच है कि हर अधिकारी सही हो, ऐसा जरूरी नहीं; और हर शिकायत गलत हो, यह भी नहीं। लेकिन निष्पक्ष जांच से पहले किसी अधिकारी को राजनीतिक विवादों के घेरे में खड़ा कर देना, प्रशासनिक तंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। इससे संदेश जाता है कि सख्ती से काम करना जोखिम भरा है।
अगर यही रवैया जारी रहा, तो आने वाले समय में अधिकारी सख्ती से निर्णय लेने से बचेंगे। वे केवल फाइलें निपटाने तक सीमित रह जाएंगे, क्योंकि हर कड़े फैसले के पीछे राजनीतिक प्रतिक्रिया का डर होगा। और जिस दिन प्रशासन डर के साये में काम करने लगेगा, उस दिन व्यवस्था की रीढ़ कमजोर हो जाएगी।
सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, पूरी व्यवस्था का है—क्या विभाग नियमों से चलेंगे या राजनीतिक संकेतों से? क्या ईमानदारी पुरस्कार बनेगी या परेशानी? क्योंकि अगर हर सख्त और ईमानदार अधिकारी को इसी तरह घेरा जाएगा, तो हार किसी एक अधिकारी की नहीं, पूरी व्यवस्था की होगी।









