सिर्फ़ रावण नहीं बल्कि अपने मन के रावण को भी जलाने की जरूरत है : तुषांत भोई

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रायपुर। फाइनेंस एवं फॉरेक्स एक्सपर्ट तथा फाइनेंशियल कंसल्टेंट तुषांत भोई ने दशहरे के पावन अवसर पर कहा कि आज आवश्यकता केवल रावण के पुतले को जलाने की नहीं, बल्कि अपने भीतर पल रहे रावण को भी समाप्त करने की है। उनका कहना है कि बाहरी रावण तो हर वर्ष अग्नि में भस्म हो जाता है, किंतु मनुष्य के हृदय और मस्तिष्क में छिपा अहंकार, क्रोध, लोभ और नकारात्मक सोच आज भी जीवित है और यही सबसे बड़ी समस्या है।

तुषांत भोई ने कहा कि रावण हजारों लोगों को संगठित कर माता सीता का हरण तो कर सका, परंतु उसने उन्हें अपमानित नहीं किया। आज के दौर का रावण अधिक खतरनाक है, जो इंसान के भीतर से ही जन्म लेता है और समाज में पनपती बुराइयों का कारण बनता है। आज इंसान अपने चेहरे पर कई मुखौटे लगाए हुए है—परिवार में एक चेहरा, दफ्तर में दूसरा, मित्रों के बीच तीसरा और सामाजिक मंच पर चौथा। यही कपट ही रावण का जीवित रूप है।

उन्होंने आगे कहा कि अच्छाई और बुराई का युद्ध केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर प्रतिदिन चल रहा है। नकारात्मक सोच इंसान की प्रगति को रोकती है, क्रोध विवेक को नष्ट करता है और लोभ इंसान को अंधी दौड़ में धकेल देता है। यही तीनों बुराइयाँ वह ज्वालामुखी हैं, जो भीतर ही भीतर इंसान को खोखला कर देती हैं।

भोई का मानना है कि सच्ची विजयदशमी तभी होगी जब हम केवल पुतला जलाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को भी अग्नि में समर्पित करें। उन्होंने कहा—

“जो व्यक्ति अपने मन के रावण को जला सके, वही रामराज्य की स्थापना की दिशा में एक सच्चा कदम बढ़ा सकता है।”

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