मध्य प्रदेश पर कर्ज का बोझ 5.42 लाख करोड़ पार

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मध्य प्रदेश पर कर्ज का बोझ 5.42 लाख करोड़ पार

सितंबर में तीसरी बार कर्ज लेने जा रही सरकार, 29 सितंबर को जुटाएगी 1500 करोड़ रुपये; छह महीने में 54 हजार करोड़ से ज्यादा बढ़ा कर्ज

 

भोपाल। मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। राज्य सरकार 29 सितंबर को 1500 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने जा रही है। यह सितंबर महीने में सरकार की तीसरी बाजार उधारी होगी। नई उधारी के बाद प्रदेश पर कुल बकाया कर्ज 5 लाख 42 हजार 614 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई है।

 

आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2026 तक मध्यप्रदेश पर करीब 4 लाख 88 हजार 714 करोड़ रुपये का कर्ज था। सितंबर के अंत तक प्रस्तावित नई उधारी के बाद यह आंकड़ा 5.42 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा। यानी करीब छह महीने में प्रदेश की देनदारी में 54 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी सामने आ रही है।

 

सितंबर में सरकार इससे पहले भी दो बार बाजार से कर्ज ले चुकी है। 29 सितंबर को प्रस्तावित 1500 करोड़ रुपये की नई उधारी को मिलाकर सितंबर में बाजार से जुटाई गई और प्रस्तावित राशि 7600 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। इस बार 800 करोड़ रुपये 18 साल और 700 करोड़ रुपये 30 साल की अवधि के लिए लिए जाने हैं। रिपोर्ट के अनुसार इन पर क्रमशः 7.61 प्रतिशत और 7.75 प्रतिशत ब्याज दर प्रस्तावित है।

 

सरकार की ओर से लगातार ली जा रही उधारी का उद्देश्य सड़क, सिंचाई, बिजली नेटवर्क और अन्य बुनियादी ढांचा एवं विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना बताया गया है। मध्यप्रदेश के वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में कुल उधारी 1,06,190 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। वहीं राजकोषीय घाटा 71,458 करोड़ रुपये यानी GSDP का 3.9 प्रतिशत अनुमानित है।

 

हालांकि, बढ़ती देनदारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल कर्ज लेने से ज्यादा उसके इस्तेमाल और भविष्य में उसके भुगतान को लेकर है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि लगातार जुटाए जा रहे हजारों करोड़ रुपये का कितना हिस्सा ऐसी परियोजनाओं में लगाया जा रहा है, जिनसे प्रदेश की आर्थिक क्षमता और भविष्य की आय बढ़ेगी। कर्ज विकास के लिए वित्त जुटाने का साधन हो सकता है, लेकिन बढ़ती देनदारियों के साथ ब्याज और मूलधन चुकाने की जिम्मेदारी भी राज्य के वित्तीय संसाधनों पर आती है।

 

अब निगाह इस बात पर है कि मध्यप्रदेश सरकार बढ़ते कर्ज के बीच राजस्व, विकास कार्यों और भविष्य की वित्तीय जिम्मेदारियों के बीच किस तरह संतुलन बनाए रखती है।

 

उजला दर्पण | जनहित में सवाल, आंकड़ों के साथ पड़ताल

 

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