72 बसों के दावों पर उठे सवाल, आरटीआई के बाद तेज हुई पारदर्शिता की मांग
जबलपुर। नगर निगम जबलपुर की बहुचर्चित “कबाड़ से कमाल” योजना एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। कभी इस योजना को शहर में नवाचार, संसाधनों के पुनः उपयोग और सामाजिक उपयोगिता का मॉडल बताकर व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया था। मंचों से इसकी सफलता के दावे किए गए, लेकिन अब इसकी वास्तविक स्थिति को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
योजना के तहत कबाड़ घोषित बसों को रैन बसेरा, महिला चेंजिंग रूम, संजीवनी क्लिनिक, पुस्तक बैंक, बर्तन बैंक, थैला बैंक और चाइल्ड प्ले बस जैसे जनहितकारी प्रोजेक्ट्स में परिवर्तित करने की बात कही गई थी। नगर निगम के अनुसार चरणबद्ध तरीके से लगभग 72 बसों का उपयोग इस उद्देश्य के लिए किया जाना था। उस समय इस पहल को शहर की बड़ी उपलब्धि और “वेस्ट टू वेल्थ” का सफल उदाहरण बताया गया था।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जिन बसों को “कमाल” बताया गया था, वे वर्तमान में कहां हैं और किस स्थिति में हैं? क्या वे आज भी जनता के उपयोग में हैं या फिर केवल उद्घाटन और प्रचार तक ही सीमित रह गईं? शहर के नागरिक और सामाजिक संगठन इन सवालों के जवाब मांग रहे हैं।
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारियों के बाद मामला और चर्चा में आ गया है। नागरिकों का कहना है कि योजना से जुड़े खर्च, बसों की वर्तमान स्थिति, रखरखाव और संचालन की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि योजना सफल रही है तो उसके परिणाम जनता के सामने आने चाहिए और यदि कहीं कमियां हैं तो उनकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
नगर निगम की इस योजना को लेकर अब सबसे अधिक चर्चा जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी को लेकर हो रही है। जिस योजना को कभी नगर निगम की उपलब्धियों में प्रमुखता से गिनाया जाता था, उसी पर उठ रहे सवालों को लेकर अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। नगर निगम आयुक्त, महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू तथा संबंधित विभागीय अधिकारियों से शहरवासी स्पष्ट जवाब की अपेक्षा कर रहे हैं।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह मांग भी उठ रही है कि योजना से जुड़ी सभी बसों, प्रोजेक्ट्स, व्यय और वर्तमान स्थिति का सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए। साथ ही संपूर्ण रिकॉर्ड जनता के सामने रखा जाए, ताकि पारदर्शिता को लेकर उठ रहे संदेह समाप्त हो सकें।
फिलहाल “कबाड़ से कमाल” योजना एक बार फिर चर्चा में है। कभी यह योजना नगर निगम की उपलब्धि मानी जाती थी, लेकिन आज यह सवालों के घेरे में खड़ी दिखाई दे रही है। अब निगाहें नगर निगम प्रशासन पर हैं कि वह इन सवालों का जवाब देता है या खामोशी का सिलसिला आगे भी जारी रहता है।










