कलेक्ट्रेट बना ऑपरेशन थिएटर! राजस्व तंत्र बना मरीज, वर्षों से जमी व्यवस्था पर चली ‘प्रशासनिक सर्जरी’

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जबलपुर तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों के बीच बड़े स्तर पर कार्य विभाजन, प्रशासनिक गलियारों में तेज हुई चर्चाएं

जबलपुर। जिला प्रशासन ने राजस्व महकमे में एक ऐसा बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। “प्रशासकीय कार्य सुविधा” का हवाला देते हुए जारी आदेश में जिलेभर के तहसीलदार, प्रभारी तहसीलदार, नायब तहसीलदार एवं प्रभारी नायब तहसीलदारों के बीच न्यायालयीन, गैर-न्यायालयीन और कार्यपालिक मजिस्ट्रेट संबंधी जिम्मेदारियों का नए सिरे से बंटवारा किया गया है। लेकिन इस आदेश के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर ऐसी व्यापक “प्रशासनिक सर्जरी” की जरूरत क्यों पड़ी?

राजस्व विभाग पिछले कई वर्षों से लगातार शिकायतों, विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण चर्चा में रहा है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा रिश्वतखोरी के मामलों में कार्रवाई होती रही है। कई राजस्व अधिकारी और कर्मचारी जांच के दायरे में आए, कई गिरफ्तार हुए और कुछ मामलों में न्यायालयीन कार्रवाई भी जारी है। ऐसे माहौल में जबलपुर में हुआ यह व्यापक फेरबदल सामान्य प्रशासनिक आदेश से कहीं अधिक महत्व रखता है।

आदेश के अनुसार जिले की लगभग सभी तहसीलों में अधिकारियों के दायित्व बदल दिए गए हैं। कहीं न्यायालयीन कार्य अलग किए गए हैं तो कहीं गैर-न्यायालयीन जिम्मेदारियां नए अधिकारियों को सौंपी गई हैं। प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही अधिकारी के पास केंद्रित अधिकारों को पुनर्व्यवस्थित करना पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

हालांकि आदेश में इस बदलाव का आधार केवल “प्रशासकीय कार्य सुविधा” बताया गया है, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में इसे व्यवस्था को नई दिशा देने वाली कार्रवाई माना जा रहा है। चर्चा यह भी है कि बदलती जिम्मेदारियों के साथ अब लंबित राजस्व प्रकरणों के निस्तारण की गति और अधिकारियों की जवाबदेही दोनों पर नजर रखना आसान होगा।

अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या यह प्रशासनिक सर्जरी केवल फाइलों तक सीमित रहेगी या वास्तव में राजस्व व्यवस्था में वर्षों से चली आ रही समस्याओं का उपचार भी करेगी। क्योंकि व्यवस्था में बदलाव केवल आदेशों से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से दिखाई देता है।

व्यंग्य

इस बार ऑपरेशन थिएटर अस्पताल में नहीं, कलेक्ट्रेट में सजा।

मरीज था—राजस्व तंत्र।

बीमारी पुरानी थी—शिकायतें, अव्यवस्था और भरोसे पर उठते सवाल।

डॉक्टरों ने दवा नहीं, जिम्मेदारियों का नया प्रिस्क्रिप्शन लिखा।

अब देखना यह है कि यह “प्रशासनिक सर्जरी” व्यवस्था को स्वस्थ बनाती है या कुछ समय बाद फिर किसी नए ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। 

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