- जबलपुर के सरकारी स्कूल में शिक्षकों की मनमानी उजागर, उजला दर्पण टीम को रिश्वत देकर चुप कराने की कोशिश

( अंकित सेन स्टेट हेड- उजला दर्पण जबलपुर )
सरकारी स्कूलों में मनमानी चरम पर है। न शिक्षक समय पर आते हैं, न पढ़ाई होती है — और जब कोई सच्चाई उजागर करने आता है, तो पत्रकारों से बदसलूकी और रिश्वत की पेशकश की जाती है।
26 जून को उजाला दर्पण समाचार पत्र की टीम ने पड़रिया संकुल के अंतर्गत आने वाले सिलुआ शासकीय एकीकृत विद्यालय का निरीक्षण किया। स्कूल खुला था, लेकिन शिक्षकों का कहीं अता-पता नहीं था। मौके पर मौजूद शिक्षिका रश्मि तिवारी से जब पूछा गया, तो उन्होंने बताया कि विद्यालय में लगभग 10 शिक्षक हैं, लेकिन “मैडम छुट्टी में हैं, बाकी भी छुट्टी में हैं।”
इसी बीच, एक कार स्कूल परिसर में आकर रुकी, जिसमें से चार-पांच लोग उतरे। उन्होंने खुद को शिक्षक बताया और कहा कि वे रिटायरमेंट पार्टी में व्यस्त हैं, जो स्कूल से कुछ दूरी पर चल रही है। उन्होंने टीम को यह कहकर टालने की कोशिश की – “अभी जाइए, हम व्यस्त हैं।”
बातचीत के दौरान शिक्षकों ने पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश की, और “बड़े पत्रकारों” से संबंधों की धौंस देने लगे। इतना ही नहीं, एक शिक्षक ने साइड में आकर उजला दर्पण के स्टेट हेड को चुपचाप पैसे थमाने की कोशिश की, ताकि खबर न छपे। लेकिन टीम ने साफ शब्दों में कहा – “हम बिकने वाले नहीं हैं, आपकी सच्चाई जनता और प्रशासन तक पहुंचेगी।” आपलोगो के इस कृत्य से यह साबित होता है कि आप शिक्षक पत्रकारों को पैसे देकर अपनी गलतियों को दबाते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं होने वाला है।
और भी खुलासा…
जब शिक्षकों से पूछा गया कि 15 जून तक डेंटिंग-पेंटिंग का कार्य क्यों नहीं हुआ, तो उन्होंने बोला – “राशि नहीं आई, और इसकी जानकारी मैडम देंगी, जो छुट्टी में हैं।”
टीम जब आगे यह जानने के लिए कि शिक्षक स्कूल में टिकते भी हैं या नहीं, यह पता करने के लिए स्कूल से बाहर कुछ दूर रुकी रही, और टीम ने एक घंटे बाद दोबारा स्कूल का निरीक्षण किया, तो देखा कि स्कूल में ताला लटक रहा था और शिक्षक–छात्र सब गायब थे। टीम पंचायत भवन में सचिव के पास बैठकर इंतज़ार करती रही, लेकिन कोई शिक्षक लौटकर नहीं आया।
जबकि वही के आस पास के अन्य गांवों की स्कूल शाम तक खुली पाई गईं। उजला दर्पण टीम के द्वारा हेड मास्टर को कॉल करके यह जानकारी बतानी चाही तो उनके द्वारा कॉल रिसीव नहीं किया।
सवाल कड़े हैं:
क्या सरकारी स्कूल अब शिक्षकों की निजी सहूलियतों के अड्डे बन गए हैं?
क्या बच्चों के भविष्य से यूं ही मज़ाक चलता रहेगा?
क्या शिक्षक मान बैठे हैं कि 200-500 रुपये में पत्रकारों को खरीद सकते हैं?
जिला शिक्षा अधिकारी और जिला कलेक्टर, जबलपुर ऐसे शिक्षकों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करें, ताकि सरकारी विद्यालयों में हो रही मनमानी बंद हो।









