आदिवासी महापंचायत में बड़े-बुजुर्गों ने अपना वक्तव्य रखते हुए बताया कि बताया कि नागपुर के देवरी को गोंड़ आदिवासी शासकों ने ही बसाया था। वह गोंड़ साम्राज्य इतना समृद्ध था कि मुगल सल्तनत को कर्ज देता थ। और आगे उन्होंने बताया कि भोपाल स्टेशन का नाम जो रानीकमलापति के नाम से रखा गया हैं वह भी आदिवासी रानी थी। जिन्होने 200 साल पूर्व भोपाल में शासन किया हैं। उनका बहुत बड़ा साम्राज्य था। आगे उन्होंने बताया कि जैसे राजपूतों को समझने के लिए हम उन्हें इतिहास में देखने के लिए पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों की ओर देखते हैं। मराठो को समझने के लिए वीर शिवाजी को इतिहास में देखते हैं। कुल मिलाकर समाज को किसी एक हिस्से को समझने के लिए हम इतिहास में उंसके योगदान को देखते हैं।
उसी तरह जब हम भारत के स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं तो अंग्रेजों के शासन के विरुद्ध अपने संघर्ष का ही ब्यौरा देते हैं इस दौरान हम अपने उस संघर्ष को विस्मित कर देते हैं, जो हमने 9वी सदी से 18वीं सदी तक इस्लामी आक्रमणकारियों के विरुद्ध किया था।और अंग्रेजों के विरुद्ध भी अपने संघर्ष का इतिहास हम 1857 से 1947 तक का ही बताते हैं। तो क्या उससे पहले अंग्रेज़ो को तनिक भी विरोध नही झेलना पड़ा? झेलना पड़ा..! तो पर हममे से यदि आज ज्यादातर लोगों को इसका पता नही हैं, अभी हम स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं तो क्या आपको पता है, देश के पहले स्वतंत्रता सेनानी कौन थे? आप कहेंगे मंगल पांडेय। पर वे 1857 के संग्राम के पहले बलिदानी जरूर थे, पर अंग्रेजों के विरुद्ध हमारे संघर्ष में सबसे पहले अपने प्राणों की आहुति देने वाले महात्मा थे- तिलका मांझी जिन्होंने तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी में जनजाति समाज को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम छेड़ा था ऐसे ही अगर आपसे पूछा जाए कि छत्तीसगढ़ के पहले स्वतंत्रता सेनानी कौन थे तो उत्तर आएगा अमर बलिदानी वीर नारायण सिंह। यदि आपसे पूछा जाए मध्य प्रदेश जबलपुर के पहले स्वतंत्रता सेनानी कौन थे तो उत्तर आएगा गोंड योद्धा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ऐसे निमाड़ क्षेत्र में भील योद्धा भीमा नायक ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। *और चित्रकूट क्षेत्र में पूछा जाए तो उत्तर आएगा पिड़रा गाँव के महुआ कोल और उनके साथी।* आधुनिक महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का बिगुल फेंकने वाले पहले सेनानी बाबूराव शेडमाके भी जनजाति समाज से ही थे। उड़ीसा के वीर योद्धा सुरेंद्र साय, तेलंगाना में राजा राम जी गोंड़ सबसे पहले बलिदानी थे। यह सब केवल भावुक बाते नही हैं, तथ्यपरक भी हैं। स्वयं अंग्रेज के अभिलेख यह बताते हैं कि 1857 के संग्राम में सबसे ज्यादा अंग्रेज सिपाही भारत मे वन क्षेत्रों में आदिवासियों के हाथों मारे गए थे। हम इस बात से अनुमान लगा सकते हैं कि अंग्रेज़ो को कैसा प्रतिरोध झेलना पड़ा होगा। लोकगाथाओं ने हमारे इतिहास के उन उजले पृष्ठों को बचाकर रखा हैं। जिनके माध्यम से हम राणा पुंजा भील, रानी दुर्गावती सरीखे आदिवासी योद्धाओं के वीरतापूर्ण संघर्ष का विवरण पाते है।











