लग्जरी गाड़ियों से गड्ढे समझ नहीं आते, कलेक्टर महोदय

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लग्जरी गाड़ियों से गड्ढे समझ नहीं आते, कलेक्टर महोदय

जनता की पीड़ा देखनी है तो वातानुकूलित कक्ष नहीं, एक बार पैदल सड़क पर उतरकर देखिए—त्योहारों की आहट के बीच गड्ढों में तब्दील शहर की सड़कें आखिर किसके विकास की कहानी कह रही हैं?

जन्माष्टमी की घंटियां बजने वाली हैं, गणेश उत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, बाजार सजने लगे हैं और शहर श्रद्धा के रंग में रंगने को तैयार है। लेकिन सड़कों पर विकास नहीं, गड्ढों का साम्राज्य दिखाई दे रहा है।

कॉलोनियों की गलियों से लेकर शहर के प्रमुख मार्गों तक जगह-जगह सड़कें जर्जर हैं। बारिश का पानी गड्ढों में ठहरकर राहगीरों और वाहन चालकों के लिए मुसीबत बन चुका है। त्योहारों के दौरान जब सड़कों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी, तब इन गड्ढों के बीच सुरक्षित आवागमन कैसे होगा?

कलेक्टर महोदय, लग्जरी गाड़ियों की आरामदायक सीटों से क्या सड़क के ये गड्ढे दिखाई नहीं देते?
क्या जनता की तकलीफ महसूस करने के लिए भी सरकारी रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ेगा?

यदि वास्तव में जनता की चिंता है तो एक दिन काफिला छोड़कर पैदल सड़क पर उतरिए। उन रास्तों पर चलकर देखिए, जहां आम आदमी रोज अपनी जान हथेली पर रखकर सफर करता है। तब शायद समझ आएगा कि गड्ढा केवल सड़क में नहीं है—व्यवस्था की कार्यप्रणाली में भी कहीं गहरी दरार है।

जब पर्वों पर लाखों कदम सड़कों पर पड़ेंगे, तब क्या प्रशासन इन गड्ढों को भी श्रद्धालुओं का स्वागत मानकर छोड़ देगा?

जनता का सवाल सीधा है—
सड़कें कब सुधरेंगी?
गड्ढे कब भरेंगे?
और कब तक निरीक्षण, निर्देश और बैठकों के कागजों में ही सड़कें दुरुस्त होती रहेंगी?

त्योहार सिर पर हैं, जनता सड़क पर है और प्रशासन के पास फिर वही निर्देश हैं—आखिर कार्रवाई कब होगी?

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