कैसा यह ‘जन-विश्वास अभियान’? रांझी तहसील में 74 वर्षीय बुजुर्ग दर-दर भटक रहा, आखिर उसका विश्वास कब जुड़ेगा, ए डी एम शैलेन्द्र सिंह तक शिकायत गई, लेकिन कार्यवाही अभी तक शून्य
तहसीलदार से लेकर एसडीएम और राजस्व निरीक्षक तक मनमानी के आरोप, क्या अधिकारियों की चौखट पर भटकती जनता भी अभियान का हिस्सा है?
जबलपुर। सरकार आम जनता का शासन-प्रशासन पर विश्वास मजबूत करने के लिए मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान चला रही है। अधिकारी शनिवार को कैंट विधानसभा क्षेत्र के 12 वार्डों में पहुंचेंगे, जनता से संवाद करेंगे और समस्याओं का मौके पर निराकरण करने का दावा किया जाएगा।
लेकिन इसी बीच रांझी तहसील की जमीनी तस्वीर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—आखिर यह जन-विश्वास अभियान किसके लिए है? ए डी एम शैलेन्द्र सिंह तक शिकायत गई, लेकिन कार्यवाही अभी तक शून्य ।
यदि 74 वर्षीय बुजुर्ग अपनी समस्या लेकर तहसील के चक्कर काटने को मजबूर है, दर-दर भटक रहा है और उसे समाधान के लिए बार-बार सरकारी चौखट पर दस्तक देनी पड़ रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—उसका विश्वास कब जुड़ेगा?
मंच पर जन-विश्वास, तहसील में ‘फाइल-विश्वास’?
अभियान में जनता से सीधा संवाद होगा। अधिकारी योजनाओं की जानकारी लेंगे। समस्याओं के त्वरित निराकरण की बातें होंगी।
लेकिन क्या रांझी तहसील में भी यही तस्वीर दिखाई देगी?
तहसीलदार, एसडीएम और राजस्व निरीक्षक स्तर पर कथित मनमानी की शिकायतों के बीच यदि एक बुजुर्ग अपनी समस्या के समाधान के लिए लगातार भटक रहा है, तो फिर जन-विश्वास की असली परीक्षा तो यहीं होनी चाहिए।
क्या अधिकारी जनता के बीच जाकर उसकी समस्या सुनेंगे या जनता को ही अधिकारियों की चौखट पर चक्कर लगाते रहने होंगे?
74 साल की उम्र में भी ‘निराकरण’ का इंतजार!
जिस उम्र में किसी बुजुर्ग को सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय सम्मान और सहज सहायता मिलनी चाहिए, उस उम्र में यदि वह अपनी समस्या लेकर दर-दर भटक रहा है, तो यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं—यह प्रशासनिक संवेदनशीलता पर सवाल है।
कहा जाता है कि जन-विश्वास एक दिन में नहीं बनता। लेकिन बार-बार की उपेक्षा से वह जरूर टूटता है।
उस बुजुर्ग के विश्वास के कितने टुकड़े हो चुके होंगे, यह शायद उसकी आंखें बता सकती हैं।
मंत्री-विधायक रांझी तहसील भी पहुंचें, तभी पूरी होगी ‘जन-विश्वास’ की तस्वीर
शनिवार को जब मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान के तहत अधिकारी कैंट क्षेत्र में पहुंचें, तो रांझी तहसील को भी केवल रास्ते का एक सरकारी कार्यालय न समझा जाए।
कैबिनेट मंत्री और क्षेत्रीय विधायक यदि वास्तव में जनता का विश्वास मजबूत करना चाहते हैं, तो रांझी तहसील पहुंचकर यह भी देखें कि—
जनता की फाइलें कहां अटकती हैं?
बुजुर्गों को कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं?
राजस्व प्रकरणों का निराकरण कितने समय में होता है?
तहसीलदार, एसडीएम और राजस्व अमले के विरुद्ध शिकायतों पर क्या कार्रवाई होती है?
और सबसे बड़ा सवाल—जिस जनता के विश्वास की बात हो रही है, वह स्वयं प्रशासन के बारे में क्या सोचती है?
जन-विश्वास अभियान की असली परीक्षा दफ्तर के बाहर नहीं, दफ्तर के भीतर होगी
जनता के बीच जाकर संवाद करना अच्छी पहल है। लेकिन जन-विश्वास केवल भाषणों, बैठकों और निरीक्षणों से नहीं बनता।
विश्वास तब बनेगा जब 74 वर्षीय बुजुर्ग को अपनी समस्या के लिए बार-बार भटकना न पड़े।
विश्वास तब बनेगा जब राजस्व की फाइलें समय पर चलें।
विश्वास तब बनेगा जब अधिकारी की चौखट पर पहुंचा नागरिक स्वयं को ‘फरियादी’ नहीं, अधिकार वाला नागरिक महसूस करे।
वरना सवाल तो उठेगा ही—
कैसा यह जन-विश्वास अभियान, जब जनता का विश्वास ही सरकारी दफ्तरों की चौखट पर टुकड़ों में बिखर रहा हो?
और उस 74 वर्षीय बुजुर्ग का विश्वास आखिर कब जुड़ेगा?










