₹25 करोड़ खर्च, फिर भी जनता प्यासी! 7 साल बाद भी 24×7 पानी का सपना अधूरा, बिना परिणाम के ठेकेदार को पूरा भुगतान स्मार्ट सिटी की महत्वाकांक्षी योजना बनी सवालों का पुलिंदा, जिम्मेदारों पर उठ रहे गंभीर सवाल

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जबलपुर | उजला दर्पण स्मार्ट सिटी मिशन के तहत जबलपुर को आधुनिक और विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस करने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। इन्हीं दावों में सबसे महत्वपूर्ण थी शहर के राइट टाउन, नेपियर टाउन और गोलबाजार क्षेत्र के करीब 10 हजार घरों तक 24 घंटे, सातों दिन निर्बाध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने की योजना। वर्ष 2019 में लगभग ₹25 करोड़ की लागत से शुरू की गई यह परियोजना आज सात वर्ष बाद भी अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकी। विडंबना यह है कि योजना का लाभ जनता तक नहीं पहुंचा, लेकिन कार्य करने वाली एजेंसी को पूरा भुगतान कर दिया गया।
परियोजना के तहत चेवेला वार्ड, भंवरताल और सर्वोदय नगर की पानी की टंकियों को पाइपलाइन के माध्यम से जोड़कर आधुनिक SCADA (Supervisory Control and Data Acquisition) प्रणाली से संचालित किया जाना था। इस तकनीक के जरिए जलापूर्ति की निगरानी, पानी का दबाव, प्रवाह, लीकेज, चोरी तथा उपभोक्ताओं की वास्तविक खपत का पूरा रिकॉर्ड कंट्रोल सेंटर से उपलब्ध होना था। दावा किया गया था कि इससे जल प्रबंधन पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी हो जाएगा।
लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट दिखाई देती है। परियोजना के तहत पाइपलाइन तो बिछाई गई, लगभग एक हजार नए नल कनेक्शन भी दिए गए और कई स्थानों पर स्मार्ट मीटर लगाए गए, लेकिन आज तक किसी भी क्षेत्र में 24 घंटे जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। जिन उपभोक्ताओं को अत्याधुनिक सुविधा मिलने का भरोसा दिया गया था, वे आज भी पुरानी व्यवस्था पर ही निर्भर हैं।
स्मार्ट मीटर बने शोपीस, SCADA सिस्टम नहीं आया काम
योजना के अनुसार प्रत्येक घर में ऑटोमेटिक मीटर लगाए जाने थे, जिनकी रीडिंग SCADA सिस्टम के माध्यम से स्वतः होती। इससे न केवल पानी की खपत का सटीक हिसाब रखा जाता, बल्कि लीकेज और जल चोरी पर भी प्रभावी नियंत्रण संभव होता। मीटरों के रखरखाव की जिम्मेदारी भी ठेका कंपनी को दी गई थी।
हालांकि, वर्षों बाद भी यह व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी। कई स्थानों पर लगे मीटर केवल औपचारिकता बनकर रह गए और करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया डिजिटल नेटवर्क अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया।
उपभोक्ताओं से भी वसूले गए पैसे
जानकारी के अनुसार जिन घरों में पुराने नल कनेक्शन थे, उनसे कनेक्शन शिफ्टिंग और मीटर लगाने के नाम पर राशि वसूली गई। वहीं नए कनेक्शन लेने वाले उपभोक्ताओं ने नगर निगम में हजारों रुपये जमा कर नए कनेक्शन प्राप्त किए। इसके बावजूद न तो उन्हें 24 घंटे पानी मिला और न ही आधुनिक जलापूर्ति प्रणाली का लाभ।
भुगतान पूरा, सुविधा अधूरी
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब परियोजना अपने उद्देश्य को पूरा ही नहीं कर सकी, तब संबंधित एजेंसी को पूरा भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या कार्यों का भौतिक सत्यापन किया गया था? यदि किया गया, तो अधूरी परियोजना को पूर्ण कैसे मान लिया गया? यदि नहीं किया गया, तो जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
जांच की जरूरत क्यों?
नगर विकास से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजना में यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नागरिकों को अपेक्षित सुविधा नहीं मिलती, तो उसकी तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक जांच होना आवश्यक है। इससे न केवल वास्तविक स्थिति सामने आएगी, बल्कि भविष्य की परियोजनाओं में जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।
तथ्य एक नजर में
परियोजना प्रारंभ: वर्ष 2019
परियोजना लागत: ₹25 करोड़
लक्षित लाभार्थी: लगभग 10 हजार घर
नए कनेक्शन: लगभग 1000
तकनीक: SCADA आधारित स्मार्ट जल प्रबंधन
वर्तमान स्थिति: 24×7 जलापूर्ति अब तक शुरू नहीं
उजला दर्पण का सवाल
यदि जनता को 24 घंटे पानी नहीं मिला, स्मार्ट मीटर काम नहीं आए और SCADA सिस्टम प्रभावी नहीं हुआ, तो ₹25 करोड़ की इस परियोजना का लाभ आखिर किसे मिला? जनता यह जानना चाहती है कि इस पूरी योजना की जवाबदेही कौन तय करेगा और सार्वजनिक धन के उपयोग का हिसाब कौन देगा?

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