सुलभ की मनमानी या सिस्टम की चुप्पी?” — आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे सत्यम सिंह!

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“सुलभ की मनमानी या सिस्टम की चुप्पी?” — आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार के आदेशों को ठेंगा दिखा रहे सत्यम सिंह!
अनुबंध ताक पर, जनता की जेब पर वार… आखिर कब रुकेगी सुलभ शौचालयों में अवैध वसूली?
जबलपुर। शहर में स्वच्छता और जनसुविधाओं के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। नगर निगम और सुलभ इंटरनेशनल संस्था के बीच हुए अनुबंध को दरकिनार कर शहर के कई सुलभ शौचालयों में आज भी जनता से निर्धारित दरों से अधिक शुल्क वसूले जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सुलभ इंटरनेशनल संस्था को नगर निगम के अनुबंध और नियमों से इतनी दिक्कत क्यों है? क्या संस्था खुद को नगर निगम प्रशासन से ऊपर समझने लगी है?
नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों और आदेशों के बावजूद यदि अवैध वसूली बंद नहीं हो रही, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक आदेशों की अवहेलना मानी जाएगी। ऐसे में जिम्मेदार अधिकारियों और संस्था से जुड़े पदाधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नगर निगम और सुलभ संस्था के बीच जो अनुबंध हुआ है, उसमें स्पष्ट प्रावधान बताए जाते हैं कि यदि संस्था अनुबंध के विपरीत गतिविधियों में लिप्त पाई जाती है, तो नगर निगम आयुक्त को अनुबंध निरस्त करने और ठेका समाप्त करने का अधिकार प्राप्त है। बताया जाता है कि यह अनुबंध लगभग तीस वर्षों के लिए किया गया था, लेकिन यदि वर्षों से लगातार शिकायतें, अवैध वसूली और नियमों की अनदेखी सामने आ रही है, तो आखिर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
आखिर नगर निगम को और कौन-सा कारण चाहिए ठेका निरस्त करने के लिए?
जब “नो प्रॉफिट, नो लॉस” के सिद्धांत पर कार्य करने का दावा करने वाली संस्था ही आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालने लगे, तो फिर उसके उद्देश्य और कार्यप्रणाली दोनों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सुलभ संस्था से जुड़े जिम्मेदार और जबलपुर के सेक्रेटरी सत्यम सिंह की कार्यप्रणाली पर भी अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आखिर किसके संरक्षण में अनुबंध की शर्तों को ताक पर रखकर मनमानी जारी है? यदि नगर निगम ने रेट लिस्ट निर्धारित कर रखी है, तो उसका पालन जमीनी स्तर पर क्यों नहीं कराया जा रहा?
जनता का कहना है कि शौचालयों के बाहर रेट लिस्ट केवल दिखावे के लिए टांगी जाती है, जबकि अंदर आम लोगों से मनमाना पैसा वसूला जाता है। गरीब, मजदूर और राहगीर रोज इस अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं।
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर यह अतिरिक्त वसूली का पैसा जा कहां रहा है? क्या यह पूरा खेल केवल जनता को ठगने और कागजों में व्यवस्था चमकाने तक सीमित है?
यदि वास्तव में अनुबंध का उल्लंघन हो रहा है, तो नगर निगम को सख्त कदम उठाने चाहिए। जनता जानना चाहती है कि क्या आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार इस मामले में कठोर कार्रवाई करेंगे? क्या सुलभ संस्था का ठेका निरस्त होगा? या फिर यह अवैध वसूली का खेल यूं ही चलता रहेगा?
शहर की जनता अब जवाब चाहती है, क्योंकि जनसुविधाओं के नाम पर जनता की जेब काटना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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