राजस्थान का नया जेल मैनुअल: तीन वर्षों की यात्रा, सुधार की दिशा और मानवीय न्याय की स्थापना

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राजस्थान में 12 दिसंबर 2022 को लागू हुआ नया जेल मैनुअल केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि कारागार व्यवस्था को आधुनिक, मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित करने का एक ठोस प्रयास है। कारागार अधिनियम, 1894 की धारा 59 के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा बनाए गए राजस्थान कारागार नियम, 2022 ने 71 वर्षों से लागू राजस्थान कारागार नियम, 1951 का स्थान लिया। तीन वर्षों की इस यात्रा ने स्पष्ट कर दिया है कि यह बदलाव समय की मांग ही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की अपरिहार्य आवश्यकता भी था।

 

1951 का मैनुअल जिस सामाजिक और प्रशासनिक परिवेश में बना था, वह आज के संवैधानिक, तकनीकी और मानवाधिकार आधारित ढांचे से मेल नहीं खाता था। सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर जेलों में सुधार, कैदियों के अधिकारों और मानवीय व्यवहार पर जोर देता रहा है। इन्हीं पृष्ठभूमियों में विशेषज्ञ समिति का गठन कर पुराने नियमों, अन्य राज्यों के जेल मैनुअल, भारत सरकार के मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 और अंतरराष्ट्रीय मानकों का अध्ययन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप एक व्यापक और व्यावहारिक नया मैनुअल अस्तित्व में आया।

 

संरचनात्मक दृष्टि से यह मैनुअल कहीं अधिक विस्तृत और स्पष्ट है। जहाँ पुराना मैनुअल 27 अध्यायों तक सीमित था, वहीं नया मैनुअल 44 अध्यायों और 1001 नियमों में फैला हुआ है। इसका मूल दर्शन इस विचार पर आधारित है कि जेल केवल दंड का स्थान नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन का केंद्र होना चाहिए। यह स्वीकार करता है कि कैदी भी संविधान प्रदत्त गरिमा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कानूनी सहायता और न्यूनतम मानवीय सुविधाओं का अधिकारी है। दंड वही होना चाहिए, जो न्यायालय ने निर्धारित किया है—उससे अतिरिक्त पीड़ा न तो वैधानिक है और न ही नैतिक।

 

मानवाधिकार संरक्षण और पारदर्शिता इस मैनुअल के प्रमुख स्तंभ हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप दुरुपयोग की रोकथाम, निष्पक्ष प्रक्रिया और जवाबदेही पर विशेष बल दिया गया है। तकनीक के उपयोग को अनिवार्य बनाते हुए प्रिजन इनमेट कॉलिंग सिस्टम, सीसीटीवी निगरानी और ई-प्रिजन्स जैसी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्रणालियाँ लागू की गई हैं, जिससे जेल प्रबंधन अधिक पारदर्शी और निगरानी योग्य बन सके।

 

महिला कैदियों, बच्चों, मानसिक रूप से बीमार बंदियों, युवा अपराधियों और मृत्युदंड प्राप्त कैदियों के लिए विशेष प्रावधान इस मैनुअल की मानवीय संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं। स्वास्थ्य परीक्षण, मानसिक परामर्श, पोषण व्यवस्था, महिला कैदियों के बच्चों के लिए क्रेच सुविधा, दया याचिकाओं की पारदर्शी प्रक्रिया और अंतिम मुलाकात जैसे प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि दंड के साथ-साथ मानवीय गरिमा भी सुरक्षित रहे। रिहा होने वाले कैदियों के लिए आफ्टर-केयर समितियाँ, कौशल विकास और पुनर्वास योजनाएँ समाज में सम्मानजनक पुनर्स्थापन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

 

यह मैनुअल केवल कैदियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कारागार स्टाफ की भूमिका, पेशेवर प्रशिक्षण, निरीक्षण प्रणाली और प्रशासनिक एकरूपता को भी स्पष्ट करता है। इससे जेल प्रबंधन अधिक वैज्ञानिक, उत्तरदायी और प्रभावी बनता है। यह स्वीकार करता है कि सुधार की प्रक्रिया द्विपक्षीय है—कैदियों और पूरे कारागार तंत्र दोनों के लिए।

 

नियम 1000 के तहत यह प्रावधान किया गया था कि नए नियमों के क्रियान्वयन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान राज्य सरकार तीन वर्षों के भीतर कर सकती है। इस अवधि में ‘आदतन अपराधी’ की परिभाषा में किया गया संशोधन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अब पाँच वर्षों की अवधि में अलग-अलग अवसरों पर दो से अधिक दोषसिद्धियाँ होने पर ही किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी माना जाएगा। यह परिवर्तन आधुनिक अपराध-विज्ञान और वर्तमान अपराध-परिदृश्य के अधिक अनुकूल है।

 

तीन वर्षों के अनुभव के बाद यह स्पष्ट होता है कि राजस्थान का नया जेल मैनुअल किसी सभ्य समाज की उस सोच को प्रतिबिंबित करता है, जिसमें राज्य अपने कैदियों को केवल अपराधी नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी मानता है। उनके जीवन, स्वास्थ्य और अधिकारों की रक्षा कानून के साथ-साथ मानवता का भी आदेश है। 2022 का यह मैनुअल राजस्थान की सौ से अधिक जेलों को आधुनिक, पारदर्शी, संवेदनशील और सुधारोन्मुख बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर सिद्ध हो रहा है।

लेखक — पारस मल जांगिड,अधीक्षक

विशिष्ट केंद्रीय कारागृह, श्यालावास, दौसा

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