Rajasthan Solar Energy Plant : सोलर पैनल के नीचे दबी खेजड़ी, थार के रेगिस्तान में विकास या विनाश?

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बीएल मान प्रधान संपादक ” उजला दर्पण ग्रुप “

हमने सिर्फ “सूरज की रौशनी मांगी थी,
लेकिन छांव की क़ीमत पर नहीं।
हरियाली का जनाज़ा निकला है,
और सरकार ने शोक सभा तक नहीं की।”

राजस्थान का थार कभी रेत के टीलों से नहीं, खेजड़ी के पेड़ों से पहचाना जाता था। आज यहां विकास के नाम पर जो हो रहा है, वह विकास नहीं, विनाश का नया नाम है। सोलर पावर की आड़ में हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। उनमें भी सबसे ज्यादा शिकार हुआ है राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’, जो मरुस्थल की नब्ज मानी जाती है।

सूरज को कैद किया, पर जड़ों को मार दिया

जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, फलोदी—इन जिलों में 26 लाख से ज़्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं, और 2030 तक 38 लाख और पेड़ काटे जाएंगे। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये हर वो छांव है जो रेगिस्तान के जीवन को जिंदा रखती थी।

सरकार का लक्ष्य:
2030 तक 65,000 मेगावाट सोलर उत्पादन
जरूरत:
92 लाख एकड़ ज़मीन
नतीजा:
लाखों पेड़, हजारों खेत, और पूरा एक जैविक तंत्र तबाह

खेजड़ी—पेड़ नहीं, पूरा जीवन तंत्र

खेजड़ी सिर्फ एक वृक्ष नहीं है। ये मिट्टी को पकड़कर रखता है, पानी को रोकता है, पशुओं के लिए चारा है, और सूखे समय में जीवनदाता। 1899 के ‘छप्पनिया अकाल’ में इसी खेजड़ी ने लोगों को जिंदा रखा था। लेकिन आज, जब बिजली बहुत है, तब वही खेजड़ी मारी जा रही है।

हरियाली की हत्या, प्रशासन मौन

स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि पेड़ों की कटाई रात के अंधेरे में JCB से की जाती है। कटे पेड़ों को गड्ढों में गाड़ दिया जाता है या जला दिया जाता है—ताकि सबूत न बचे।

नियम: 11 से अधिक पेड़ों की कटाई पर सरकारी अनुमति ज़रूरी
हकीकत: नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं
परिणाम: तापमान 5 डिग्री तक बढ़ चुका है, खेती का उत्पादन 75% तक गिर चुका है

 किसान हारे, युवा बेरोजगार

रेगिस्तान में ज़मीन बेचने वाले किसान आज पशुओं के लिए चारा तक नहीं जुटा पा रहे। युवाओं के पास न रोजगार है न विकल्प। प्लांट्स में 12 घंटे की शिफ्ट और 400 रुपये मजदूरी में सपना, ज़मीन और भविष्य—तीनों बिक गए।

एक किसान की कहानी:

80 बीघा ज़मीन बेची, पांच साल में पैसा खत्म, नौकरी खत्म, अब गांव छोड़ दिया।

 जब विधायक भी धरने पर बैठे

बाड़मेर से विधायक रविंद्र सिंह भाटी खुद धरने पर बैठे हैं, खेजड़ी की कटाई रोकने के लिए। प्रशासन को महीनों से सूचना दी जा रही है, पर कोई सुनवाई नहीं। सरकार की चुप्पी और कंपनियों की मनमानी ने इस आपराधिक गठजोड़ को और मजबूत कर दिया है।

सवाल ये नहीं कि सोलर चाहिए या नहीं।

सवाल ये है कि क्या पर्यावरण की लाश पर विकास खड़ा होगा?

हरियाली का जनाज़ा निकल रहा है और न कोई मातम है, न सवाल।

सरकार “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान चलाती है और दूसरी तरफ उन्हीं पेड़ों की हत्या पर मौन साध लेती है। क्या ये दोहरी नीति नहीं?

सूरज से बिजली बनाइए, पर छांव की क़ीमत पर नहीं।
विकास कीजिए, लेकिन जड़ों को काटकर नहीं।
खेजड़ी बचाइए—ये राजस्थान की पहचान है, इसकी सांस्कृतिक और जैविक आत्मा है।

अगर आज नहीं रुके, तो कल सिर्फ बिजली बचेगी, पर न मिट्टी होगी, न हरियाली, न जीवन।

यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं, यह जीवन और मृत्यु का सवाल है।
यह सिर्फ पश्चिमी राजस्थान की नहीं, पूरे देश की चेतावनी है।
अब भी वक़्त है—सोचिए, बोलिए और बचाइए।

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