जबलपुर में फायर सेफ्टी या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

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जबलपुर में फायर सेफ्टी या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

जबलपुर। शहर में लगातार खड़ी हो रही बहुमंजिला कमर्शियल बिल्डिंगें, कोचिंग सेंटर, अस्पताल, होटल और शोरूम एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं—क्या इन भवनों में आग से बचाव के सभी इंतजाम हैं, या फिर अनुमति देने वाली एजेंसियां केवल फाइलों में सुरक्षा देख रही हैं?

दिल्ली समेत देश के कई शहरों में हुए अग्निकांडों ने साबित किया है कि आग लगने के बाद जांच बैठाना आसान है, लेकिन हादसे से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। ऐसे में जबलपुर में भी सवाल उठ रहा है कि जिन भवनों में पर्याप्त फायर सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा, उन्हें संचालन की अनुमति आखिर कैसे मिल रही है?

क्या निर्माण अनुमति देने से पहले फायर सुरक्षा का भौतिक सत्यापन होता है? यदि होता है तो फिर कमियां कैसे रह जाती हैं? और यदि नहीं होता, तो जिम्मेदार कौन है?

शहरवासियों का कहना है कि हर बड़े हादसे के बाद नोटिस, सर्वे और जांच अभियान शुरू हो जाते हैं, लेकिन कार्रवाई पहले क्यों नहीं होती? आखिर प्रशासन किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहा है या सुरक्षा नियमों का पालन भी सुनिश्चित करेगा?

सवाल सीधा है— “जब आग नहीं लगी थी, तब जिम्मेदार अधिकारी कहां थे?”

क्योंकि हादसे के बाद फायर ब्रिगेड पहुंचती है, लेकिन उससे पहले सुरक्षा व्यवस्था पहुंचनी चाहिए।

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