953 खिड़कियों वाले महल से जुड़े वो राज, जिनसे आप भी है अनजान
उजला दर्पण , जयपुर। जयपुर का हवा महल (Hawa Mahal) मरुधरा के समृद्ध राजाओं की निशानी और वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। हवा महल (Hawa Mahal) मरुधरा (Rajasthan ) की शान मने जाने वाले जयपुर में एक विश्व प्रशिद्ध पहचान है जिसे यहां की पीढ़ियों ने संजोकर रखा है।
करीब 953 जालीदार झरोखों वाले इस महल का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया गया था। महल की ये जालीदार खिड़कियाँ महल के तापमान को ठंडा रखती हैं जिस वजह से इसका नाम हवा महल रखा गया। आइए जानते है इस महल से जुडी कुछ रोचक जानकारियां …..
कहा जाता है कि रियासत काल में रानियों को आम जनता के बीच जाने की अनुमति नहीं होती थी इसलिए उन्हें आम लोगों की दिनचर्या से रुबरु करवाने और शहर का हालचाल दिखाने के लिए इस झरोखे नुमा महल का निर्माण करवाया गया था। आकर्षक छोटी-छोटी जालीदार खिड़कियाँ हैं, जिन्हें झरोखा कहते हैं। झरोखेदार खिड़कियों से रानियाँ सब कुछ देख सकती थी। लाल- गुलाबी बलुआ पत्थरों से निर्मित यह महल दूर से मधुमक्खी के छत्ते के समान प्रतीत होता है।
हार्ट अटैक: एक जानलेवा समस्या
इस गुलाबी महल के कारण ही जयपुर को गुलाबी शहर (pinkcity ) की के नाम से जाना जाता है । राजपूत शिल्प कला तथा मुगल शैली के मिश्रण से बनी इस इमारत के अंदर एक पुरातात्त्विक संग्रहालय भी मौजूद है। महल में राधा- कृष्ण का एक मंदिर भी है जो को प्रेम को दर्शाता है।
हवामहल पाँच-मंजिला स्मारक है जिसकी अपने मुख्य आधार से ऊंचाई 87 फीट (26.15 मी॰) है। महल की सबसे ऊपरी तीन मंजिलों की चौड़ाई का आयाम एक कमरे जितना है जबकि नीचे की दो मंजिलों के सामने खुला आँगन भी है, जो कि महल के पिछले हिस्से में बना हुआ है। महल का सामने का हिस्सा, जो हवा महल के सामने की मुख्य सड़क से देखा जाता है। इसकी प्रत्येक छोटी खिड़की पर बलुआ पत्थर की बेहद आकर्षक और खूबसूरत नक्काशीदार जालियाँ, कंगूरे और गुम्बद बने हुए हैं। यह बेजोड़ संरचना अपने आप में अनेकों अर्द्ध अष्टभुजाकार झरोखों को समेटे हुए है, जो इसे दुनिया भर में बेमिसाल बनाते हैं। इमारत के पीछे की ओर के भीतरी भाग में अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार कक्ष बने हुए हैं जिनका निर्माण बहुत कम अलंकरण वाले खम्भों व गलियारों के साथ किया गया है और ये भवन की शीर्ष मंजिल तक इसी प्रकार हैं।
“पर्दा प्रथा” को ध्यान में रखकर किया गया था निर्माण
Hawa Mahal का निर्माण सन 1799 ई. में करवाया गया था, जिसकी रूप रेखा प्रसिद्ध वास्तुकार लाल चंद उस्ता ने तैयार की थी। Hawa Mahal का निर्माण इस बात को ध्यान में रखकर किया गया था कि रानियाँ “पर्दा प्रथा” का सम्मान करते हुए बाहर के दृश्यों का आनंद उठा सकें।
हवा महल के ऊपर की दो मंजिलों पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों के बजाय स्लोप्स (Cramped) की व्यवस्था की गई थी ताकि लंबे राजपूती लिबास पहनकर भी रानियां इन पर आसानी से चढ़ सकें।
सिटी पैलेस की ओर से हवा महल में शाही दरवाजे से प्रवेश किया जा सकता है। यह एक विशाल आँगन में खुलता है, जिसके तीन ओर दो-मंजिला इमारतें हैं और पूर्व की और भव्य हवा महल स्थित है। इस आँगन में एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है।
हवा महल महाराजा जय सिंह का विश्राम करने का पसन्दीदा स्थान था क्योंकि इसकी आन्तरिक साज-सज्जा बेहद खूबसूरत है। इसके सभी कक्षों में, सामने के हिस्से में स्थित 953 झरोखों से सदा ही ठण्डी हवा बहती रहती थी, जिसकी ठण्डक का प्रभाव गर्मियों में और बढाने के लिए सभी कक्षों के सामने के दालान में फव्वारों की व्यवस्था भी है। हवा महल में सीधे सामने की और से प्रवेश की व्यवस्था नहीं हैं। हवा महल में प्रवेश के लिए, महल के दायीं व बायीं ओर से बने मार्गों से प्रवेश की व्यवस्था है, जहाँ से आप महल के पिछले हिस्से से महल में प्रवेश पाते हैं।









