दिव्यांग को देखकर कुर्सी छोड़ जमीन पर बैठे नगर निगम आयुक्त, संवेदनशीलता और सहजता ने जीता जनमानस का दिल

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दिव्यांग को देखकर कुर्सी छोड़ जमीन पर बैठे नगर निगम आयुक्त, संवेदनशीलता और सहजता ने जीता जनमानस का दिल

आईएएस पद की गरिमा के साथ मानवीय संवेदनाओं का अद्भुत संगम, जनसुनवाई में दिखाई सेवा और सहृदयता की मिसाल

जबलपुर। किसी व्यक्ति की महानता उसके पद, प्रतिष्ठा अथवा अधिकारों से नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्यमान मानवीय संवेदनाओं, सहज व्यवहार और दूसरों के दुःख को अपना समझने की भावना से परिलक्षित होती है। जब कोई उच्च पद पर आसीन अधिकारी अपने पद की औपचारिकता से ऊपर उठकर मानवीय संवेदना को प्राथमिकता देता है, तब उसका व्यक्तित्व केवल प्रशासनिक अधिकारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जनमानस के हृदय में सम्मान का स्थान प्राप्त कर लेता है।

मंगलवार को नगर पालिक निगम जबलपुर की जनसुनवाई में ऐसा ही एक भावुक एवं प्रेरणादायी दृश्य देखने को मिला। नगर निगम आयुक्त श्री राम प्रकाश अहिरवार के समक्ष जब दोनों पैरों से दिव्यांग एक व्यक्ति अपनी जल समस्या लेकर पहुंचे, तो आयुक्त ने अपनी कुर्सी छोड़ दी और उनके समीप जमीन पर बैठकर उनकी परेशानी को आत्मीयता से सुना।

यह दृश्य केवल एक अधिकारी के जमीन पर बैठने का प्रसंग नहीं था, बल्कि उस संवेदनशील सोच का परिचायक था, जिसमें पद की ऊंचाई से अधिक महत्व इंसान की पीड़ा को दिया जाता है। एक आईएएस अधिकारी के रूप में प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी उनकी यह सहजता, विनम्रता और मानवीय दृष्टिकोण निश्चित रूप से सराहनीय है।

दिव्यांग नागरिक ने अपने घर में जल सुविधा एवं नल लगवाने से संबंधित समस्या रखी। आयुक्त ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई कर नल की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए त्वरित निर्देश दिए, ताकि समस्या का शीघ्र समाधान हो सके और नागरिक को राहत मिल पाए।

पद की गरिमा बनाए रखते हुए अहंकार से दूर रहना ही सच्चे व्यक्तित्व की पहचान है। प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारों का उपयोग करना एक दायित्व है, लेकिन उन अधिकारों के बीच मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखना एक महान गुण है। श्री अहिरवार का यह सहज व्यवहार इसी मानवीय पक्ष को उजागर करता है।

जबलपुर शहर में किसी अधिकारी की विशिष्ट पहचान केवल उसके द्वारा लिए गए निर्णयों और कराए गए विकास कार्यों से ही नहीं बनती, बल्कि इस बात से भी बनती है कि वह आम नागरिक की बात कितनी आत्मीयता से सुनता है और उसकी पीड़ा को कितनी गंभीरता से समझता है। जनसुनवाई में प्रदर्शित यह संवेदनशीलता इसी जनोन्मुखी प्रशासनिक दृष्टिकोण की एक उल्लेखनीय झलक है।

सहजता ही व्यक्तित्व का सौंदर्य है, संवेदनशीलता ही महानता का आभूषण है और जनसेवा ही किसी पद की वास्तविक सार्थकता है। जब एक अधिकारी इन तीनों गुणों को अपने आचरण में उतारता है, तब उसका सम्मान केवल कार्यालय की सीमाओं तक नहीं रहता, बल्कि लोगों के मन में स्थायी स्थान बना लेता है।

नगर निगम आयुक्त का यह व्यवहार एक सार्थक संदेश देता है कि जनसेवा का वास्तविक अर्थ केवल समस्याओं पर आदेश जारी करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति के पास पहुंचकर उसकी पीड़ा को समझना और समाधान के लिए तत्पर होना भी है। यही सहजता, यही सहृदयता और यही मानवीय दृष्टिकोण किसी भी व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाते हैं।

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