नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार से प्रेरित स्वच्छता संकल्प: माँ के दर्शन को आए, माँ के तट की सेवा में झुक गए बाजार अधीक्षक राजेंद्र दुबे; स्वयं थामी झाड़ू, दिया सच्ची भक्ति का संदेश

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माँ नर्मदा के दर्शन करने पहुँचे बाजार अधीक्षक राजेंद्र दुबे, घाट पर स्वयं थामी झाड़ू; बोले—स्वच्छता ही माँ की सच्ची सेवा

नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार से प्रेरित स्वच्छता संकल्प: माँ के दर्शन को आए, माँ के तट की सेवा में झुक गए बाजार अधीक्षक राजेंद्र दुबे; स्वयं थामी झाड़ू, दिया सच्ची भक्ति का संदेश

जबलपुर। माँ नर्मदा के दर्शन करना श्रद्धा है, लेकिन उनके पावन तट को स्वच्छ रखना उस श्रद्धा का सच्चा सम्मान है। इसी भाव को कर्म में उतारते हुए नगर निगम के बाजार अधीक्षक राजेंद्र दुबे ने पितृ मोक्ष अमावस्या के पावन अवसर पर गौरीघाट में स्वच्छता की प्रेरक मिसाल प्रस्तुत की। दर्शन के लिए पहुँचे राजेंद्र दुबे ने जब घाट के समीप सड़क पर प्रसाद के दोने-पत्तल और अन्य अपशिष्ट बिखरे देखे, तो वे केवल व्यवस्था पर प्रश्न उठाकर आगे नहीं बढ़े, बल्कि स्वयं हाथ में झाड़ू लेकर सफाई में जुट गए।

गंदगी देख तत्काल सक्रिय हुए, टीम को दिए निर्देश

पितृ मोक्ष अमावस्या पर राजेंद्र दुबे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती सरिता दुबे के साथ माँ नर्मदा के दर्शन करने गौरीघाट पहुँचे थे। दर्शन के पश्चात उनकी दृष्टि घाट के आसपास बिखरी गंदगी पर पड़ी। भंडारे में प्रसाद ग्रहण करने के बाद कुछ लोगों द्वारा दोने-पत्तल और अन्य अपशिष्ट सड़क पर छोड़ दिए गए थे। आस्था के इस पावन स्थल पर गंदगी का दृश्य देखकर उन्होंने तत्काल बाजार विभाग की टीम को सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश दिए।

इसके बाद उन्होंने स्वयं झाड़ू की व्यवस्था कर हाथ में झाड़ू थामी और सफाई कार्य में जुट गए। उनके इस प्रयास के साथ टीम के सदस्यों ने भी सफाई व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग किया। राजेंद्र दुबे की इस पहल ने यह संदेश दिया कि स्वच्छता केवल सफाईकर्मियों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

माँ के दर्शन के साथ घाट की स्वच्छता भी जरूरी

राजेंद्र दुबे की पहल का संदेश स्पष्ट था—माँ नर्मदा के दर्शन के लिए आना तभी सार्थक है, जब हम उनके पावन तट की निर्मलता और पवित्रता बनाए रखने का संकल्प भी लें। तीर्थस्थल पर पूजा-अर्चना करना, दीपदान करना और प्रसाद ग्रहण करना हमारी आस्था के प्रतीक हैं, लेकिन इन कार्यों के बाद वहाँ गंदगी छोड़ देना उसी आस्था की भावना के विपरीत है।

माँ के चरणों में शीश झुकाना श्रद्धा है, लेकिन उनके पावन तट को स्वच्छ रखने के लिए स्वयं झुककर झाड़ू लगाना सेवा है। यही वह भाव है, जो धार्मिक आस्था को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। घाट की सफाई में लगाया गया श्रम भी माँ नर्मदा के प्रति सम्मान और समर्पण की अभिव्यक्ति है।

श्रद्धालु भी निभाएँ अपनी जिम्मेदारी

गौरीघाट जैसे पवित्र स्थलों पर पर्वों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। ऐसे अवसरों पर भंडारे और प्रसाद वितरण के बाद दोने-पत्तल तथा अन्य अपशिष्ट निर्धारित स्थान पर डालना आवश्यक है। श्रद्धालुओं को यह समझना होगा कि तीर्थस्थल की पवित्रता केवल धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि स्वच्छ आचरण से भी बनी रहती है।

बाजार अधीक्षक राजेंद्र दुबे और उनकी टीम की यह पहल समाज को प्रेरित करती है कि स्वच्छता के लिए केवल दूसरों से अपेक्षा न करें, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर स्वयं भी आगे आएँ।

माँ नर्मदा के दर्शन से पुण्य लाभ की कामना करने वाले श्रद्धालु यदि उनके तट को स्वच्छ रखने का संकल्प भी लें, तो यही श्रद्धा का सच्चा विस्तार होगा। माँ का तट स्वच्छ रहेगा, तभी उसकी सुंदरता, गरिमा और पवित्रता भी बनी रहेगी।

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