सरकारी संपत्ति निजी नाम, राजस्व अमला अनजान?
पटवारी, आरआई और तहसीलदार की भूमिका पर सवाल—सरकारी जमीन का 30 साल का पट्टा निजी नाम कैसे हुआ, जिम्मेदारी तय कब?
जबलपुर। नगर निगम की शासकीय संपत्ति का 30 साल का पट्टा निजी व्यक्ति के नाम होने के मामले ने अब राजस्व अमले की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब संपत्ति सरकारी थी तो राजस्व रिकॉर्ड में इसकी स्थिति क्या दर्ज थी और इसके बावजूद निजी नाम पर पट्टा जारी होने तक संबंधित अधिकारियों ने क्या जांच की?
मामले में अब पटवारी से लेकर राजस्व निरीक्षक और तहसीलदार तक की भूमिका जांच के दायरे में आने की जरूरत है। सवाल यह भी है कि पट्टा प्रकरण की फाइल किस-किस स्तर से होकर गुजरी और किस अधिकारी ने दस्तावेजों का सत्यापन किया?
नगर निगम आयुक्त रामप्रकाश अहिरवार द्वारा संपत्ति को निगम के आधिपत्य में लिए जाने और संबंधित टैक्स कलेक्टर को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। यदि पट्टा नियम विरुद्ध जारी हुआ है तो उसे निरस्त करने के साथ-साथ पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—सरकारी संपत्ति निजी नाम तक पहुंची कैसे? और यदि राजस्व रिकॉर्ड में सब कुछ स्पष्ट था, तो पटवारी, आरआई और तहसीलदार स्तर पर यह गड़बड़ी पकड़ में क्यों नहीं आई?










