किसान के नाम पर फर्जीवाड़ा, बाजार की मूंग MSP पर बेची
EOW का खुलासा : समिति कर्मचारियों ने जमीन मालिकों को भनक तक नहीं लगने दी, खुद को सिकमीदार बताकर कराया पंजीयन
भोपाल।
रायसेन। किसानों के नाम पर संचालित सरकारी समर्थन मूल्य योजना में फर्जीवाड़े का गंभीर मामला सामने आया है। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की जांच में खुलासा हुआ है कि सहकारी समितियों के कर्मचारियों ने वास्तविक भूस्वामी या कौलीदार की जानकारी और सहमति के बिना उनकी जमीन पर मूंग का पंजीयन कराया। रिकॉर्ड में खुद को सिकमीदार दर्शाने के बाद बाजार से सस्ती मूंग खरीदी गई और उसे किसानों की उपज बताकर सरकारी उपार्जन केंद्रों पर समर्थन मूल्य पर बेच दिया गया।
जांच के मुताबिक इस पूरे खेल से करीब 13.35 लाख रुपए का अनुचित लाभ अर्जित किया गया। मामला बाड़ी तहसील निवासी की शिकायत के बाद जांच के दायरे में आया।
तीन समितियों के रिकॉर्ड खंगाले
EOW ने जिला सहकारी बैंक रायसेन की बाड़ी शाखा से संबद्ध देहरीकला, भारकच्छ कला और गूगलवाड़ा सहकारी समितियों में वर्ष 2024-25 और 2025-26 के मूंग पंजीयन एवं उपार्जन रिकॉर्ड की जांच की।
जांच में देहरीकला समिति के कंप्यूटर ऑपरेटर श्रीराम ठाकुर, कर्मचारी रंजीत ठाकुर और भारकच्छ कला समिति के कंप्यूटर ऑपरेटर गौरव ठाकुर की भूमिका सामने आई है।
₹1500 से ₹3300 की मूंग, MSP पर ₹8558 में बेची
EOW के अनुसार आरोपियों ने बरेली मंडी, व्यापारियों और खुले बाजार से 1500 से 3300 रुपए प्रति क्विंटल की दर से मूंग खरीदी। इसके बाद इसी मूंग को किसानों की उपज दर्शाकर सरकारी उपार्जन केंद्रों पर समर्थन मूल्य पर बेच दिया गया।
वर्ष 2024-25 में मूंग का समर्थन मूल्य ₹8558 प्रति क्विंटल और वर्ष 2025-26 में ₹8682 प्रति क्विंटल रहा।
यानी बाजार से कम कीमत पर खरीदी गई मूंग को किसानों की उपज बताकर सरकारी व्यवस्था में कहीं अधिक कीमत पर खपाने का कथित खेल सामने आया।
श्रीराम ने 151 क्विंटल से ज्यादा मूंग बेची
EOW की जांच के मुताबिक श्रीराम ठाकुर ने 151.524 क्विंटल मूंग सरकारी व्यवस्था में बेचकर करीब 8.61 लाख रुपए का अनुचित लाभ अर्जित किया।
वहीं रंजीत ठाकुर को करीब 2.40 लाख रुपए और गौरव ठाकुर को करीब 2.34 लाख रुपए का अनुचित लाभ होने की बात जांच में सामने आई है।
तीनों मामलों में अनुचित लाभ की कुल राशि करीब 13.35 लाख रुपए बताई गई है।
किसानों को पता तक नहीं—न कौलीनामा, न पंजीयन की जानकारी
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन किसानों की जमीन का इस्तेमाल मूंग पंजीयन के लिए किया गया, जांच में उनके द्वारा न तो कोई कौलीनामा दिए जाने और न ही पंजीयन की जानकारी होने की बात सामने आई।
इसके बावजूद रिकॉर्ड में वास्तविक भूस्वामी या कौलीदार के स्थान पर आरोपियों ने खुद को सिकमीदार दर्शाया और सरकारी समर्थन मूल्य व्यवस्था का लाभ उठा लिया।
शिकायत के बाद खुला मामला
यह मामला बाड़ी तहसील निवासी की शिकायत के बाद जांच में आया। शिकायत के आधार पर EOW ने संबंधित सहकारी समितियों के पंजीयन, किसानों की जमीन से जुड़े दस्तावेज, मूंग की बिक्री और उपार्जन रिकॉर्ड की पड़ताल की। जांच आगे बढ़ने के साथ समिति स्तर पर पंजीयन प्रक्रिया और सरकारी खरीद व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
भास्कर पहले ही उठा चुका था सवाल
इस मामले को लेकर 24 जून 2026 को प्रकाशित खबर में भी सवाल उठाए गए थे—“EOW जांच करता रहा, फर्जी किसानों को करोड़ों बांट दिए।”
अब EOW की जांच में समिति स्तर पर पंजीयन से लेकर मूंग के सरकारी उपार्जन तक कथित गड़बड़ी की परतें सामने आ रही हैं।
अब जांच के दायरे में पूरी व्यवस्था
मामला केवल तीन कर्मचारियों द्वारा अनुचित लाभ लेने तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसानों की जमीन का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किस आधार पर किया गया? रिकॉर्ड में सिकमीदार का दर्जा किसने और किन दस्तावेजों के आधार पर दर्ज किया?
पंजीयन के समय संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ? बाजार से खरीदी गई मूंग को सरकारी उपार्जन केंद्र पर किसान की उपज के रूप में स्वीकार करने से पहले जिम्मेदार अधिकारियों ने जांच क्यों नहीं की?
और सबसे अहम सवाल—क्या यह खेल केवल 13.35 लाख रुपए के अनुचित लाभ तक सीमित था, या इसी तरीके से अन्य किसानों के नाम और जमीन का इस्तेमाल कर सरकारी समर्थन मूल्य योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया?
EOW की आगे की जांच में इन सवालों के जवाब सामने आने की उम्मीद है।










