एग्रीमेंट में ₹5, जमीनी हकीकत में ₹10 से ₹20! जबलपुर के सुलभ कॉम्प्लेक्सों में नियमों की धज्जियां
जबलपुर। जबलपुर नगर निगम क्षेत्र में संचालित सुलभ जन सुविधा केंद्रों को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए गए इन शौचालय कॉम्प्लेक्सों में आम नागरिकों से निर्धारित शुल्क से अधिक राशि वसूले जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध अनुबंध (एग्रीमेंट) की शर्तें स्पष्ट रूप से उपयोग शुल्क तय करती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वास्तविक वसूली इससे कई गुना अधिक बताई जा रही है।
उपलब्ध अनुबंध के अनुसार सार्वजनिक शौचालय कॉम्प्लेक्स का संचालन पे-एंड-यूज़ आधार पर किया जाना है। अनुबंध की शर्तों में स्पष्ट उल्लेख है कि शौचालय (W.C.) उपयोग हेतु ₹5 तथा स्नान सुविधा के लिए ₹5 शुल्क निर्धारित है। साथ ही यह भी प्रावधान है कि रखरखाव लागत में वृद्धि को देखते हुए शुल्क में संशोधन केवल हर तीन वर्ष में अधिकतम 10 प्रतिशत तक ही किया जा सकता है।
इसके बावजूद शहर के कई सुलभ कॉम्प्लेक्सों में नागरिकों से शौच के लिए ₹10 तथा स्नान के लिए ₹20 तक लिए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। सवाल यह है कि जब अनुबंध की शर्तें स्पष्ट हैं, तो अतिरिक्त वसूली किस आधार पर की जा रही है? क्या इन बढ़ी हुई दरों को नगर निगम की स्वीकृति प्राप्त है, या यह मनमानी वसूली है?
अनुबंध का एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि सार्वजनिक शौचालयों के संचालन हेतु जल एवं विद्युत आपूर्ति का खर्च प्रथम पक्ष यानी नगर निगम द्वारा वहन किया जाना है। ऐसे में नागरिकों के बीच यह सवाल और गहरा हो रहा है कि जब पानी और बिजली का खर्च भी संस्था पर नहीं है, तो फिर तय शुल्क से अधिक राशि क्यों वसूली जा रही है?
इतना ही नहीं, अनुबंध में यह भी स्पष्ट है कि द्वितीय पक्ष यानी संचालन करने वाली संस्था को सार्वजनिक शौचालयों की नियमित सफाई, मरम्मत और रखरखाव अपने खर्च और अपने स्टाफ से करना है। लेकिन शहर के कई सुलभ कॉम्प्लेक्सों की जमीनी स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े करती है। कई स्थानों पर गंदगी, टूट-फूट, बदहाल व्यवस्थाएं और अस्वच्छ माहौल देखने को मिल रहा है। इससे रखरखाव और मेंटेनेंस के नाम पर खर्च होने वाली राशि और उसकी वास्तविकता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं।
अनुबंध की धारा यह भी कहती है कि यदि संचालनकर्ता संस्था निर्माण, सफाई, रखरखाव या मरम्मत में लापरवाही करती है, तो नगर निगम को अनुबंध समाप्त करने तक का अधिकार है। इसके बावजूद यदि लगातार शिकायतों के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल अब नगर निगम प्रशासन और निगमायुक्त की भूमिका पर खड़ा हो रहा है। जब एग्रीमेंट की शर्तें स्पष्ट हैं, जनता की शिकायतें सामने हैं और वसूली के आरोप लगातार उठ रहे हैं, तो फिर जांच और कार्रवाई में देरी क्यों? क्या प्रशासन इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराएगा?
जनता की मांग है कि नगर निगम तत्काल शहर के सभी सुलभ जन सुविधा केंद्रों की दर सूची, वास्तविक वसूली, रखरखाव व्यवस्था और अनुबंध अनुपालन की जांच कराए। यदि कहीं भी अनुबंध उल्लंघन या वित्तीय अनियमितता पाई जाती है, तो जिम्मेदारों पर कड़ी कार्रवाई हो और जनता से ली गई अतिरिक्त राशि की जवाबदेही तय की जाए।
अब देखना यह होगा कि यह मामला सिर्फ मामला बनकर रह जाता है या नगर निगम प्रशासन इस पर ठोस कदम उठाकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।










