जबलपुर। 

हे स्वच्छता के महानायकों, तुम्हारी चुप्पी ने मुझे इस हाल में पहुंचा दिया।
मैं रानीताल मुक्तिधाम हूं — जहां हर किसी को एक न एक दिन आना है।
लेकिन क्या किसी ने सोचा है कि जहां अंतिम संस्कार होना है, वहां सड़ांध, गंदगी और उपेक्षा क्यों फैली है?
जोन क्रमांक 02 के CSI विष्णुकांत दुबे, क्या आपको नहीं दिखता कि आपके ही क्षेत्र का मुक्ति धाम सिसक रहा है?
मेरे सवाल हैं — और अब मैं चुप नहीं रहूंगा।
कचरे के ढेर, बदबूदार नालियां, और गंदगी से अटी पड़ी ज़मीन — यही है मेरी पहचान?
शहर मुझे “मुक्तिधाम” कहता है, लेकिन मेरे आसपास जो हो रहा है, वो किसी श्मशान का नहीं, एक बदहाल कूड़ाघर का दृश्य है।
नगर निगम कमिश्नर और प्रशासन से सीधा सवाल — क्या मुक्ति धाम के लिए कोई बजट नहीं होता?
या फिर मुर्दों के लिए सफाई ज़रूरी नहीं समझी जाती?
महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, क्या आपने कभी मेरे हालात देखने की ज़हमत उठाई?
आप संस्कारधानी जबलपुर की बात करते हैं — मगर यहां अंतिम संस्कार भी अपमान से भरा है।
मेरे यहां आत्माएं शांति की तलाश में आती हैं — लेकिन उन्हें मिलता है सड़ांध, कीचड़ और उपेक्षा।
साफ-सफाई के नाम पर कर्मचारी महीनों से गायब हैं।
मेरे चारों तरफ बजबजाती नाली बह रही है, जिस पर शायद सालों से किसी की नज़र नहीं गई।
कर्मचारी कागजों में सक्रिय हैं, और मैं मिट्टी में गुमनाम।
तो क्या अब सभी मुक्ति धामों को मिलकर आंदोलन करना होगा?
क्या मरने के बाद भी सम्मान के लिए लड़ाई जरूरी है?
मैं रानीताल मुक्तिधाम हूं — आज जिंदा हूं, लेकिन दम तोड़ रहा हूं।
मेरी मांग साफ है — मुझे गंदगी से मुक्ति दो।












