क्या मेरी पुकार सुनाई नहीं देती? क्या आत्माओं को शांति का हक़ नहीं? क्या कब्रों और चिताओं के बीच कचरे की परत ही मेरी पहचान बनकर रह जाएगी?”

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मैं मुक्तिधाम हूं, मुझे भी गंदगी से मुक्त कर दो
– रानीताल मुक्तिधाम से उठती दर्दनाक पुकार, कब्रों और चिताओं के बीच पसरा कचरा और खामोश प्रशासन।

का रानीताल मुक्तिधाम अब सिर्फ़ अंतिम संस्कार की जगह नहीं रहा, ये अब एक बदहाल, उपेक्षित और गंदगी से भरा मैदान बन चुका है। ज़ोन क्रमांक 2 के अंतर्गत आने वाला ये इलाका नगर निगम की लापरवाही और असंवेदनशीलता की जीती-जागती मिसाल बन गया है।

यहां एक ओर ईसाई समाज का कब्रिस्तान है, दूसरी ओर हिंदू मुक्तिधाम। लेकिन हालत दोनों की एक जैसी – चारों तरफ कचरा, प्लास्टिक, सूखे फूलों के ढेर, सड़ती हुई सामग्री और मवेशियों का जमावड़ा। जहां आत्माओं को शांति मिलनी चाहिए, वहां अब बदबू और गंदगी फैली हुई है।

क्या मरने के बाद भी चैन नहीं?

रानीताल मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार के लिए जब लोग दूर-दूर से आते हैं तो उन्हें न पानी मिलता है, न बैठने की व्यवस्था, न शौचालय और न ही रोशनी। बुज़ुर्ग हों या महिलाएं, सबको असुविधा झेलनी पड़ती है। लेकिन नगर निगम की तरफ से अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं किया गया।

जबलपुर महापौर विधायक संसद मंत्री सभी तो आते हैं मुझ तक , लेकिन किसी की दृष्टि नहीं पड़ती मेरी दयनीय स्थिति पर।

यह मुक्तिधाम अपने हालात खुद बयान कर रहा है:

> “क्या मेरी पुकार सुनाई नहीं देती?
क्या आत्माओं को शांति का हक़ नहीं?
क्या कब्रों और चिताओं के बीच कचरे की परत ही मेरी पहचान बनकर रह जाएगी?”

कब्रों में दफन लोग जैसे सवाल कर रहे हैं — “क्या हमारी मौत के बाद भी हमें सज़ा दी जा रही है?”
और चिताओं की राख जैसे फुसफुसा रही है — “हमें मुक्त कर दो, इस गंदगी से, इस उपेक्षा से।”

सवाल नगर निगम से है —

क्या यही है जबलपुर की स्वच्छता की असलियत?

क्या सिर्फ दिखावे के लिए अभियान चलेंगे और ज़मीन पर कुछ नहीं होगा?

क्या मौत के बाद भी सम्मान नहीं बचा?

जरूरी मांगें:

मुक्तिधाम और कब्रिस्तान की रोज़ाना सफाई व्यवस्था

पीने के पानी की उपलब्धता

महिलाओं और बुज़ुर्गों के लिए टॉयलेट

रोशनी, छांव और बैठने की सुविधा

स्थायी सफाईकर्मियों की तैनाती और निगरानी

अब वक़्त आ गया है कि जबलपुर नगर निगम इस मौन पुकार को सुने।
ये सिर्फ़ एक स्थान की सफाई की मांग नहीं है — ये मरने वालों की आत्मा की इज़्ज़त की मांग है।
“मैं मुक्तिधाम हूं, मुझे भी गंदगी से मुक्त कर दो” – ये सिर्फ़ एक लाइन नहीं, ये एक शहर की ज़मीर को झकझोर देने वाली चीख़ है।

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