आयुष्मान कार्ड बना कमीशन का कूपन! अस्पतालों का ऑफर—मरीज लाओ, हजारों कमाओ
भोपाल के आसपास कथित ‘मरीज सप्लाई नेटवर्क’ का सनसनीखेज खुलासा; मरीज असली हो या नहीं, अस्पतालों को चाहिए सिर्फ आयुष्मान कार्ड!
भोपाल। आयुष्मान योजना गरीब और जरूरतमंदों के लिए उपचार का सहारा बनी है, लेकिन भोपाल के आसपास सामने आए कथित फर्जीवाड़े के आरोप इस व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। पड़ताल में ऐसे आरोप सामने आए हैं कि कुछ अस्पतालों में आयुष्मान कार्डधारी व्यक्ति को मरीज बनाकर लाने के बदले बिचौलियों को हजारों रुपए तक कमीशन देने का कथित खेल चल रहा है।
मामला सिर्फ कमीशन तक सीमित नहीं बताया जा रहा। पड़ताल के दौरान अस्पताल संचालकों और कर्मचारियों से हुई बातचीत में कथित तौर पर यह सामने आया कि मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने वाले एजेंट को प्रति मरीज 2 हजार से 10 हजार रुपए तक दिए जाने की बात कही गई। कमीशन की राशि कथित रूप से मरीज के बिल पर निर्भर होने की बात भी सामने आई—अर्थात जितना बड़ा बिल, उतना बड़ा कथित कमीशन!
मरीज की जरूरत बाद में, आयुष्मान कार्ड पहले?
सबसे गंभीर सवाल यही है कि यदि किसी व्यक्ति को वास्तविक उपचार की आवश्यकता नहीं है, तो उसे अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत क्यों पड़ती है? यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह न केवल सरकारी योजना की राशि पर चोट है, बल्कि वास्तविक जरूरतमंद मरीजों के अधिकारों के साथ भी खिलवाड़ है।
पड़ताल में मारुति अस्पताल, आनंद नगर से जुड़े संवाद में कथित रूप से 2 हजार रुपए प्रति मरीज कमीशन की बात सामने आई। अधिक मरीज लाने पर पेट्रोल के अतिरिक्त भुगतान की चर्चा भी हुई।
एक अन्य बातचीत में डॉक्टर द्वारा कथित रूप से व्हाट्सऐप पर कमीशन की राशि बताने की बात कही गई और 2500 रुपए प्रति मरीज की राशि का उल्लेख सामने आया।
सरकारी योजना या बिचौलियों का बाजार?
आयुष्मान भारत योजना का उद्देश्य पात्र परिवारों को कैशलेस उपचार उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि कार्डधारकों को ही अस्पतालों के लिए ‘मरीज जुटाने’ का माध्यम बनाया जा रहा है, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
सवाल सीधा है—क्या आयुष्मान कार्ड अब उपचार का अधिकार है या अस्पतालों के लिए कमीशन कमाने का जरिया?
जांच सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर चाहिए
अब जरूरत बयान जारी करने से आगे बढ़कर अस्पतालों के रिकॉर्ड, आयुष्मान क्लेम, भर्ती मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री, जांच रिपोर्ट, डिस्चार्ज समरी और एजेंटों के कथित भुगतान की निष्पक्ष जांच की है। यदि कहीं फर्जी मरीजों के नाम पर सरकारी राशि का दावा किया गया है, तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होना आवश्यक है।
आयुष्मान भारत निरामयम योजना के सीईओ अरविंद शाह ने भी कहा है कि आयुष्मान के नाम पर फर्जी मरीजों का इलाज गलत है और अस्पतालों का निरीक्षण कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अब देखना यह है कि कथित कमीशनखोरी के इस खेल की जांच कितनी गहराई तक पहुंचती है और क्या वास्तव में उन अस्पतालों तथा बिचौलियों पर कार्रवाई होती है, जो गरीबों के इलाज की योजना को कथित ‘मरीज सप्लाई कारोबार’ में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
उजला दर्पण का सवाल
अगर आयुष्मान कार्ड दिखाते ही मरीज की ‘कीमत’ तय होने लगे, तो फिर गरीब के इलाज की गारंटी कौन देगा—सरकार या कमीशन का खेल?










