फरवरी 2025 की शिकायत, CM हेल्पलाइन, चार जनसुनवाई और EOW के पत्र के बावजूद कार्रवाई पर सवाल; शिकायतकर्ता के बयान तक नहीं, अब हाईकोर्ट जाने की तैयारी
अंकित सेन
स्टेट हेड, उजला दर्पण मध्यप्रदेश
जबलपुर। भ्रष्टाचार के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” की नीति के दावों के बीच जबलपुर का एक मामला प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है। सूत्रों के अनुसार रांझी तहसील के तत्कालीन राजस्व निरीक्षक दरगंजन यादव एवं अन्य के विरुद्ध पहली शिकायत फरवरी 2025 में की गई थी, लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी मामला अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसके बाद दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई गई, जो लगभग आठ माह तक लंबित रही। इतना ही नहीं, चार बार जनसुनवाई में आवेदन देने के बावजूद शिकायतें बार-बार उसी रांझी तहसील भेजी जाती रहीं, जिसके विरुद्ध शिकायत की गई थी। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस कार्यालय के विरुद्ध शिकायत हो, क्या वही उसकी निष्पक्ष जांच कर सकता है?
इसी प्रकरण में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW), भोपाल ने पत्र क्रमांक 467/26,00779/2026(I) दिनांक 10 मार्च 2026 को कलेक्टर जबलपुर को आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र भेजा, जो 18 मार्च 2026 को कलेक्टर कार्यालय पहुंच गया था। सूत्रों के अनुसार यह पत्र लगभग चार माह तक स्थापना शाखा में लंबित रहा। यदि प्रदेश की सबसे बड़ी भ्रष्टाचार जांच एजेंसी के आधिकारिक पत्र पर भी समयबद्ध कार्रवाई नहीं हो सके, तो आम नागरिक की शिकायतों के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
सूत्रों के अनुसार पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस शिकायतकर्ता के आवेदन पर पूरा प्रकरण प्रारंभ हुआ, उसके आज तक बयान दर्ज नहीं किए गए। शिकायतकर्ता का दावा है कि उसे न तो बयान के लिए कोई सूचना दी गई और न ही उसका पक्ष दर्ज किया गया। इसके विपरीत 2 जुलाई 2026 को राजस्व निरीक्षक दरगंजन यादव के बयान दर्ज कर लिए गए और अगले ही दिन 3 जुलाई 2026 को तत्कालीन रांझी तहसीलदार का अन्य तहसील में स्थानांतरण हो गया। अब यह प्रश्न उठ रहा है कि शिकायतकर्ता को सुने बिना जांच आगे कैसे बढ़ी? और जो कार्रवाई चार माह तक नहीं हुई, वह स्थानांतरण से ठीक पहले अचानक कैसे पूरी हो गई?
सूत्रों के अनुसार एक और गंभीर तथ्य सामने आया है। EOW द्वारा भेजे गए पत्र के साथ शिकायतकर्ता के आवेदन की प्रति भी संलग्न थी, लेकिन बाद में संबंधित पत्रावली में शिकायत आवेदन उपलब्ध नहीं मिला। यदि यह तथ्य सही है, तो यह गंभीर जांच का विषय है। आखिर शिकायत का आवेदन कहां गया? क्या यह केवल अभिलेखीय त्रुटि है या फिर दस्तावेजों के रख-रखाव में किसी स्तर पर गंभीर चूक हुई? यदि प्रदेश की शीर्ष जांच एजेंसी के पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों की स्थिति यह है, तो सामान्य नागरिकों के आवेदन कितने सुरक्षित हैं?
सूत्रों के अनुसार शिकायतकर्ता अब पूरे मामले को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की शरण लेने की तैयारी कर रहा है। साथ ही वह कलेक्टर जबलपुर को भी समस्त दस्तावेज उपलब्ध कराकर इस प्रकरण का संज्ञान लेने, स्वतंत्र जांच समिति गठित करने तथा पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध करेगा। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर न्याय नहीं मिला, तो न्यायालय की शरण ली जाएगी।
अब पूरा मामला कलेक्टर जबलपुर के समक्ष है। क्या EOW के पत्र क्रमांक 467/26,00779/2026(I) पर हुई देरी की जिम्मेदारी तय होगी? क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन और जनसुनवाई की लंबित शिकायतों की समीक्षा होगी? क्या शिकायतकर्ता के बयान दर्ज किए जाएंगे? क्या यह जांच होगी कि आवेदन पत्र पत्रावली से कैसे गायब हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी या समिति से कराई जाएगी?
यह केवल एक शिकायत का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और जनविश्वास की परीक्षा है। जनता अब आरोप नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब चाहती है।
(यह समाचार उपलब्ध दस्तावेजों, प्राप्त जानकारी एवं सूत्रों के आधार पर तैयार किया गया है। समाचार में उल्लिखित तथ्यों की निष्पक्ष जांच संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा किया जाना अपेक्षित है। संबंधित पक्ष का स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)










