दूषित पेयजल पर एनजीटी का कठोर प्रहार
प्रशासनिक शिथिलता पर कड़ी टिप्पणी, कलेक्टर व नगर निगम से दो सप्ताह में संयुक्त प्रतिवेदन तलब
जबलपुर।
नालों की दुर्गंध और मलजल के बीच से गुजरती पेयजल पाइपलाइनों के कारण नागरिकों के स्वास्थ्य पर मंडरा रहे संकट को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने अत्यंत गंभीर माना है। सुनवाई के दौरान अधिकरण ने जिला प्रशासन एवं नगर निगम की उदासीन कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी करते हुए दो सप्ताह के भीतर संयुक्त स्थलीय निरीक्षण कर विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया कि जनस्वास्थ्य से जुड़े ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी।
निर्देशों की अवहेलना पर अधिकरण की नाराजगी
एनजीटी ने कहा कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने स्थल निरीक्षण नहीं किया। इसे प्रशासनिक दायित्वों की उपेक्षा मानते हुए अधिकरण ने मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ संयुक्त निरीक्षण कर वस्तुस्थिति का तथ्यात्मक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
नोडल एजेंसी की रिपोर्ट ने खोली व्यवस्था की परतें
नोडल एजेंसी द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया कि जबलपुर की लगभग 80 प्रतिशत पेयजल पाइपलाइन नालों के समानांतर अथवा उनके भीतर से गुजर रही हैं, जबकि लगभग 47 प्रतिशत नागरिक आज भी सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जिला प्रशासन एवं नगर निगम के अपेक्षित सहयोग के अभाव में कई स्थानों का निरीक्षण नहीं हो सका, जिससे प्रतिवेदन तैयार करने में विलंब हुआ।
जनहित याचिका पर बढ़ी प्रशासन की जवाबदेही
नागरिक उपभोक्ता मंच के डॉ. पी. जी. नाजपांडे एवं रजत भार्गव द्वारा दायर जनहित याचिका पर एनजीटी ने पूर्व में एक माह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। निर्धारित अवधि बीत जाने के बावजूद प्रतिवेदन प्रस्तुत न होने पर अधिकरण ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाया।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया— नहीं मिला अपेक्षित सहयोग
10 जुलाई 2026 की सुनवाई में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अधिकरण को अवगत कराया कि नगर निगम और जिला प्रशासन के समुचित सहयोग के अभाव में संयुक्त निरीक्षण सम्पन्न नहीं हो सका। समयाभाव और समन्वय की कमी भी निरीक्षण में बाधा बनी।
कलेक्टर एवं निगम आयुक्त को तत्काल पत्र भेजने के निर्देश
न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह एवं विशेषज्ञ सदस्य सुशील कुमार की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अधिकरण के रजिस्ट्रार को निर्देश दिए कि जबलपुर कलेक्टर एवं नगर निगम आयुक्त को तत्काल पत्र प्रेषित कर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ संयुक्त निरीक्षण सुनिश्चित कराया जाए।
चार से पाँच दशक पुरानी पाइपलाइन बनी जनस्वास्थ्य के लिए चुनौती
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रभात यादव ने न्यायालय को बताया कि शहर की अधिकांश पेयजल पाइपलाइन 40 से 50 वर्ष पुरानी हो चुकी हैं तथा अनेक स्थानों पर क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। इसके बावजूद इनके प्रतिस्थापन अथवा व्यापक मरम्मत के लिए अब तक कोई ठोस कार्ययोजना अथवा डीपीआर तैयार नहीं की गई है।
काले और दुर्गंधयुक्त पानी ने खोली व्यवस्था की पोल
मामला उस समय चर्चा में आया जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद वार्ड सहित अन्य क्षेत्रों से नलों में काला एवं दुर्गंधयुक्त पानी आने की शिकायतें सामने आईं। पार्षद अदिति अतुल गुप्ता ने भी सदन में यह विषय उठाते हुए कहा कि कई स्थानों पर पेयजल पाइपलाइन नालों के भीतर से गुजर रही हैं। पाइपलाइन में रिसाव होने से दूषित नाले का पानी पेयजल में मिलकर सीधे घरों तक पहुंच रहा है, जिससे नागरिकों के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ पेयजल नागरिकों का मौलिक अधिकार है। यदि निर्धारित समय में संयुक्त प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध आगे की वैधानिक कार्रवाई पर भी विचार किया जाएगा।










